अद्भुत प्रभुता आज निहारी | Adbhut Prabhuta Aaj Nihari

अद्भुत प्रभुता आज निहारी, आनंद उर न समाया है।
मानो रंक लही चिन्तामणि, त्यों निज वैभव पाया है ।।टेक।।

ध्रुव चैतन्यमयी जीवन लख, जन्म अरु मरण नशाया है।
दर्शन ज्ञान चक्षु दो शाश्वत, लोकालोक दिखाया है ।।1।।

सुख शक्ति देखी क्या मानों, सुख सागर लहराया है।
निज सामर्थ्य अनंत निहारी, ओर छोर नहिं पाया है ।।2।।

अब स्वाधीन अखंड प्रतापी, शोभा युत प्रभु भाया है।
निज के सब भावों में व्यापक, विभु प्रत्यक्ष दिखाया है ।।3।।

सदा प्रकाशित परम स्वच्छ, मोहान्धकार विनशाया है।
स्वानुभूति से निज अंतर में, निजानन्द रस पाया है ।।4।।

मुक्ति की भी नहिं अभिलाषा , मुक्त स्वरूप दिखाया है।
परम तृप्ति उपजी अब मेरे, निज में सर्वस्व पाया है ।।5।।

हो निस्पृह उपकारी प्रभुवर, निजपद हमें दिखाया है।
भाव सहित वंदन हे जिनवर, ये रहस्य दरशाया है ।।6।।

Artist - ब्र. रविन्द्र जी 'आत्मन्'


Singer: @Deshna

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