तर्ज : हमको भी बुलवा लो भगवन् …
अहो ! अहो आराधूँ भगवन्, समयसार अविकार मैं।
स्वयं-स्वयं में तृप्त रहूँ प्रभु, भ्रमूँ नहीं संसार में ।। टेक ।।
समयसार ही ध्येय रूप है, समयसार ही ध्यान में।
समयसारमय रत्नत्रय से, जाऊँगा भव पार मैं।। 1।।
समयसार को बिन पहिचाने, पाया दुख अपार मैं।
आराधन कर समयसार का, तिष्ठूँ मुक्ति मँझार में।। 2।।
देखा जाना समयसार ही, तीन भुवन में सार मैं।
सहज परम शान्त परमातम, समयसार सुखकार मैं ।। 3।।
दीखें सब स्वारथ के जग में, जाना जगत् असार मैं।
एक मात्र पाया जीवन में, समयसार आधार मैं ।। 4।।
धन्य हुआ कृतार्थ हुआ, नहाऊँ समरस धार में।
पाया स्वाभाविक ज्ञानानन्द, आनन्द अपरम्पार मैं ।। 5।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १७७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’