अपना कोई नहीं है रे जगत का झूँठा है व्यवहार | Apna Koi Nahin Hai Re Jagat Ka Jhoontha Hai Vyavhar

अपना कोई नहीं है रे जगत का झूँठा है व्यवहार

(राग ख्याल तमाशा व गजल)

अपना कोई नहीं है रे जगत का झूँठा है व्यवहार ॥टेर ॥

माता कहै यह पुत्र हमारा, पिता कहै सुत मेरा ।
भाई कहै यह भुजा हमारी, त्रिया कहै पति मेरा ॥१॥

माता न्हाती घर के द्वारे, त्रिया न्हाती खूणै ।
भाई भतीजा स्वार्थ का सीरी हंस अकेला धूणै ॥२॥

ऊँचे महल स्वार्थ दरवाजे, भाँत-भाँत की टाटी।
आतम राम अकेलो जासी पड़ी रहैगी माटी ॥३॥

घर में तिरया रोवण लागी, जोड़ी बिछड़न लागी।
‘चन्द्रकृष्ण’ कहै परभव जाता संग चलै नहिं तागी ॥४ ॥


स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन १६ (विभिन्न कवियों के भजन)

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