तर्जः कितना सुन्दर कितना सुखमय…
अहो ! परम उपकार जिनेश्वर, अहो ! परम उपकार रे।
भव्यजनों को दर्शाया प्रभु, समयसार अविकार रे।। टेक ।।
समयसार को पाकर स्वामी, हम सब हुए कृतार्थ रे।
प्रभो ! आपके पथ पर चलकर, साधेंगे परमार्थ रे।। 1।।
हुई प्रतीति निज प्रभुता की, मन पायो विश्राम रे।
मति व्यवस्थित हुई नाथ, हम ध्यावें आतम राम रे।। 2।।
हुई निःशंक सहज निर्वांछक, सत्य पंथ निर्ग्रन्थ रे।
प्रगटावें हम भी हे जिनवर, साक्षात् शिवपंथ रे।। 3।।
उपसर्गों में अडिग रहें हम, नाशें विषय- कषाय रे।
निजपद में ही लीन रहें प्रभु, परम दशा प्रगटाय रे।। 4।।
चित्त विभोर हुआ भक्ति में, धरें आप सा ध्यान रे।
कर्म-कलंक समूल नशावें, बनें स्वयं भगवान् रे।। 5।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ५९ से ६०
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’