अहो! परमामृत बरसावे, सहज ज्ञानामृत बरसावे | Aho Paramamrt Barasave Sahaj Jnanamrt Barasave

तर्ज : केशरिया चावल …

अहो! परमामृत बरसावे, सहज ज्ञानामृत बरसावे ।
निज अंतर में, निज हेतु परमामृत बरसावे ।।

श्री सिद्धचक्र पूजन विधान में, अमृत बरसावे ।।टेक ।।

(दोहा) - काव्य अरे छोटे दिखें, भाव भरे गम्भीर।
जो समझे अभिप्राय को, सो पावे भव तीर ।। 1 ।।

साक्षी में जिनराज के, अपनी ओर निहार ।
कर अनुभव ‘मैं हूँ प्रभु’, उपजे सुख अपार ।।2।।

अनुभूति आराधना, ज्ञायक प्रभु आराध्य ।
पूर्ण होय आराधना, प्रगट होय शिव साध्य ।।3।।

अरे ! भटकता व्यर्थ ही, निज में ही विश्राम।
जाननहार शुद्धात्मा, है परमानंद धाम ।।4।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २७३