तर्ज : लखी लखी…
आओ भविजन आओ-आओ मुक्तिमार्ग में आओ।
लोकोत्तम जिनशासन पाया, भेदज्ञान प्रगटाओ ॥ टेक ॥
देह भिन्न है, जीव भिन्न है, ऐसी श्रद्धा लाओ।
रागादिक से भिन्न ज्ञानमय, शुद्ध निजातम ध्याओ॥ 1 ॥
शिवकारण अरु शिव स्वरूप, आतम-अनुभव प्रगटाओ।
उदासीन हो भव-भोगों से, तत्त्व भावना भाओ॥ 2 ॥
तजो कुसंग सु सत्संगति से, ज्ञानाभ्यास बढ़ाओ।
निज स्वभाव का आश्रय लेकर, दृढ़ वैराग्य सुहायो ॥ 3 ॥
हो निःशंक निर्भय निर्वाछक, मुनिपद को अपनाओ।
हो निशल्य निर्द्वन्द्व निराकुल, निर्मल ध्यान लगाओ ॥ 4 ॥
जीतो सब उपसर्ग परीषह, कर्म कलंक नशाओ।
आतम गुण प्रगटाओ प्रभु सम, स्वयं प्रभु बन जाओ ॥ 5 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३५५
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’