आवो आवो आवो आवो मम हृदय विराजो हे सुखधर,
तुम अघनाश हरो मम आश करो कुछ वास हे करुणाकर,
हे बाल प्रभु तुम बालविभु, त्रयज्ञान हितु भविजन जेतु,
तुम गुणनिकंद! हो भवि-भगवंत! त्रिकालपूज्य मुक्ति सेतु ।।
हम पांडुक जावें पूज रचावें नाचें गावें नंद करें,
धरि धरम सुचर्चें द्रविगुनपरजैं अरचै तुम भावी हंतैं,
है नरक शांत है स्वर्ग सुखी,जब भूमि पर प्रभु चरण धरें,
दशदिश गूंजे जयमाला से, अहो बाल प्रभु जयवंत रहें ।।
धन्य धन्य मन मयूर हर्षित क्यों आज रे ।
जगत पूज्य जगतनाथ, तीरथ करतार आयो रे ।।
नटखट ये नयन अंग कोमल छवि प्यारी है ।
शुभ कण सब लोक के तेरे ही देह वासी हैं ।।
आपकी छवि देखने है तीन लोक तरसता ।
मम नयन सुपात्र में ये तेरा रूप बरसता ।।
ये सहस्र नेत्र सुखी आपको निहारते ।
त्रिभुवन के दुःख आप हरते हरते हरते ।। धन्य धन्य मन मयूर…
रत्नवृष्टि भूमि पर, हैं सप्त स्वर बरस रहे ।
शब्द भी मृदंग के, हैं भक्ति को तरस रहे ।।
बाजत वीणा सु आज गीत तेरे गा रही ।
बांसुरी भी मानो तेरी कीर्ति गुनगुना रही ।।
अंबर सब धधकता है तेरे दिव्यनाद से ।
समकित के मेघ आज बरसे बरसे बरसे ।। धन्य धन्य मन मयूर..
शब्द - दिव्यांश जैन
स्वर -अमन जैन, आलाप भट्ट
संगीत - अन्वय जैन