तर्ज : माँ जिनवाणी मुझ अंतर में…
आत्मन् अब निज की ओर लखो, परमानंद पाओ अंतर में।
क्यों व्यर्थ भटकते मूढ़ बने, अपनी निधि शाश्वत अपने में । ।टेक ।।
है दर्शन ज्ञान सु अन्तर में, सुख का सागर है अन्तर में।
है वीर्य अनंत सु अन्तर में, शाश्वत प्रभुता है अन्तर में ।। 1 ।।
उलझन विकल्प तो परलक्षी, है मोह अन्धेरा बाहर ही।
है समाधान निज अंतर में, चैतन्य प्रकाश सु अन्तर में ।।2।।
मुक्ति सदैव ही प्राप्त अहो, कारण परमात्मा अन्तर में।
मुक्ति में वही विराज रहे, रम गये सहज जो अन्तर में ।।3।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’