जगत् में क्षमा भाव उर धार ।। टेक ।।
उत्तम क्षमा वीर मुनि भूषण, गावत सब संसार।
अन्तर बाहर शत्रु न कोई, रहे सदा अविकार ।। 1।।
सुन कटु वचन खेद नहिं आने, पर शत्रुता टार।
जीव मात्र से क्षमा भाव रख, पाकर के अधिकार ।। 2।।
जिनमुद्रा में प्रथम सुलक्षण, क्षमा देखियत सार।
नहीं क्रोध कायरता किंचित्, रहित विभाव विकार।। 3।।
जीवन की संग्राम भूमि में, हों विभाव कई बार।
किन्तु आत्म गुण क्षमा समझ, सब करो क्षमा स्वीकार ।। 4 ।।
पंच परम पद पावे, इससे परमानन्द अपार ।
भव-सागर से पार उतरते, क्षमा तरणि ले हाथ।। 5।।
क्षमा गरल को सुधा बनाती, लख लौकिक व्यवहार।
दुष्ट सुजन होते पाते हम, क्षमा मंत्र इक सार।। 6।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’