आचार्य कुन्दकुन्द जो मारग न दिखाते।
शुद्धात्म सुधा सार कहो कौन पिलाते ॥टेक।।
दर्शन थे विदेहों में किए जा सीमंधर के,
फिर लौट के आए यहाँ उपदेश को ले के।
जिनवाणी हमें आज न जो आप सुनाते ।।1॥
श्रीमान् ने नाटक है समयसार बनाया,
अरु सूरि सुधाचन्द्र ने है कलश चढ़ाया।
जयचन्द से विद्वान् जो टीका न रचाते ॥2॥
प्रवचन व नियमसार से हैं ग्रन्थ बनाए,
पंचास्तिकाय-अष्टपाहुड़ ग्रन्थ रचाए।
निज-पर का भेदज्ञान हमें जो न सिखाते ॥3॥
ये जीव है व्यवहार से बहु रूप कहाता,
है नियत नय से एक सदा दृष्टा-ज्ञाता।
नय पक्ष हमें आ के जो न आप सुझाते ॥4॥
आचार्य कुन्दकुन्द हमारे गुरु ज्ञानी,
परमात्मा सम आत्मा की महिमा बखानी।
आनन्दमय होकर गुरो! हम शीश झुकाते ।।5॥
• श्रद्धेय ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
Lyrics - Baal Br. Shree Ravindra Ji ‘Aatman’