अब अघ करत लजाय रे भाई
(राग काफी कनड़ी - ताल पसतो)
अब अघ करत लजाय रे भाई ॥अब. ॥टेक ॥
श्रावक घर उत्तम कुल आयो, भैंटे श्री जिनराय ॥१॥अब. ॥
धन वनिता आभूषन परिग्रह, त्याग करौ दुखदाय ।
जो अपना तू तजि न सकै पर, सेयां नरकन जाय ॥२॥अब. ॥
विषय काज क्यौं जनम गुमावै, नरभव कब मिलि जाय।
हस्ती चढ़ि ईंधन ढोवे, बुधजन कौन वसाय ॥३ ॥अब. ॥
Artist: पं. बुधजन जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ८
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