तर्ज : सफल भई आज मेरी नजरिया…
अब तो ज्ञाता-दृष्टा रहना,
मोह किसी से भी नहीं करना।
प्रभु ने मुक्तिमार्ग दरशाया,
उस पर चलना, नहीं भव धरना ।। टेक ।।
पुण्य उदय से अवसर आया,
फिर भी अंध हो विषयन धाया।
आज प्रभु का दर्शन पाया,
विषय छोड़ कर निज हित करना ।। 1 ।।
पावन सम्यग्दर्शन पावें,
मोह अंधेरा दूर भगावें।
प्रभु जैसा ही ध्यान लगावें,
भक्त नहीं हमको प्रभु बनना।। 2।।
वस्तु न कोई सुख-दुःख दाता,
व्यर्थ जगत् में मैं भरमाता।
आतम को आतम में साता,
सुख अतीन्द्रिय मुझको भरना।। 3।।
जो होना है सो ही होता,
मैं तो मूर्खपने से रोता।
धर्मध्यान का अवसर खोता,
अब न मुझे कुछ विकल्प करना ।। 4 ।।
यह भव पाया भव हरने को,
पावन रत्नत्रय धरने को ।
समता रस आस्वादी बनकर,
निज शाश्वत् शिवपद को वरना ।। 5 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३७३ से ३७४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’