आया शरण में तेरी, हे आदिनाथ स्वामी।
अक्षय आत्म-निधि पाऊँ, तुम संग हे अन्तर्यामी।। टेक।।
अति पुण्योदय से जिनवर, पावन जिनशासन पाया।
वस्तु स्वरूप जाना, निस्सार जग दिखाया।। 1।।
पर भावों से अति न्यारा, निर्दोष ध्रुव निजातम।
ज्ञायक स्वरूप अविकल, निरूपम शाश्वत परमातम।। 2।।
प्रभुवर प्रसाद तेरा, पुरुषार्थ सहज मेरा।
आतम स्वरूप ध्याऊँ, मेटूँ भव-भव का फेरा।। 3।।
चरणों में शीस नाऊँ, निर्ग्रन्थ हो वन जाऊँ।
सब कर्म बन्ध छूटें, निर्मुक्त प्रभुता पाऊँ।। 4।।
— ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’