तर्ज : घड़ी जिनराज…
अहो जिनधर्म मंगलमय, अहो जिनधर्म लोकोत्तम ।
धर्म ही जग में इक शरणा, हृदय में धार लेवें हम ।। टेक ।।
धर्म बिन दुःख सहे भव में, धर्म ही सर्व सुख दाता।
निरापद नित रहे वह ही, धर्म में चित्त जो लाता ।।
धर्म बिन कोई नहीं अपना ।। हृदय में.।। 1।।
धर्म तो सब कहें जग में, धर्म विरला ही पहिचाने ।
करे जो स्वानुभव सुखमय, धर्म का मर्म वह जाने ।।
धर्म तो भाव समतामय ।। हृदय में.।। 2।।
कहा सर्वज्ञ ने वस्तु स्वभाव ही धर्म आनंदमय ।
मूल सम्यक्दर्श जिसका, धर्म है ज्ञान चारित्रमय ।।
धर्म के दश कहे लक्षण ।। हृदय में. ।। 3।।
जहाँ हिंसा का पोषण हो, धर्म का अंश नहिं मानो ।
वीतरागी अहिंसा ही धर्म, परमार्थ पहिचानो ।।
सहज धर्मी के आश्रय से ।। हृदय में. ।। 4।।
यह अवसर चूक मत जाना, तत्त्व निर्णय करो भाई ।
महा सौभाग्य से ऐसी, निधि हमने यहाँ पाई ।।
छोड़कर सर्व पक्षों को ।। हृदय में.।। 5।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २६१
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’