आतम अनुभव करना रे भाई ! निज का अनुभव करना रे | atama anubhava karana re bhai nija ka anubhava karana re

आतम अनुभव करना रे भाई ! निज का अनुभव करना रे ।

आतम अनुभव नहीं किया तो, भव-भव में दुःख भरना रे ।। टेक ।।

बहुत बार जिन-पूजन कीनी, शास्त्र अनेक सु-पढ़ डाले ।
मुनिव्रत भी धारण करके, फिर घोर परीषह भी झेले ।।
लेकिन आतम ज्ञान बिना नहीं, ये भव सागर तिरना रे ।। 1 ।।

सुख विशेष गुण है आतम का, आतम में ही रहता है।
तन-मन-धन के किसी भाग में, कभी न पाया जाता है ।।
इसीलिए ज्ञानी जन कहते, आतम सन्मुख होना रे ।। 2 ।।

तूने अपनी शक्ति खोई, झूठे व्यर्थ विकल्पों में।
शान्ति न किंचित् मिली अभी तक इन मिथ्या संकल्पों में ।।
आकुल-व्याकुल हुआ आत्मन् ! अब इनको परिहरना रे ।। 3 ।।

अहो ! स्वानुभव सार जगत् में, सच्चा सुख प्रदाता है।
जो निज में ही स्थिर होता, स्वयं मुक्ति पद पाता है।।
अहो ! सुखार्थी महामहिम शुद्धातम शरणा लेना रे।। 4।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३५६ से ३५७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’