आज समाज में देखो ये क्या हो रहा? Aaj samaj me dekho

आज समाज में देखो ये क्या हो रहा ?
सदाचार-वात्सल्य कहाँ पर खो गया?

मन में मायाचार यहाँ पर
शब्दों के असि वार यहाँ पर
दिखलाने का प्यार यहाँ है
रिश्वत ही उपहार यहाँ है
न निश्चय-व्यवहार है दिखता
धर्म तो अब व्यापार है लगता
अरे! सरलता धर्म कहाँ पर खो गया?
सदाचार-वात्सल्य कहाँ पर खो गया?

रात्रि-भोजन घर-घर होता
जमीकंद का सेवन होता
होटल में सब शान से खाते
मद्यपान से ना शर्माते
खान-पान परिधान में हिंसा
साज-श्रृंगार में भी है हिंसा
धर्म अहिंसा छुप कर बैठा रो रहा,
सदाचार-वात्सल्य कहाँ पर खो गया?

“वीतरागता” मात्र हैं लिखते
राग भाव में धर्म समझते
सुख-दुख कर्ता प्रभु को माने
वीतराग प्रभु को ना पहचाने
तत्वज्ञान को नहीं समझते
“मनमानी” जिनवाणी हैं कहते
“प्रवचन” भी अब व्यवसाय हो गया
सदाचार-वात्सल्य कहाँ पर खो गया?

दो सुनकर के चार सुनाते
शब्दों के हैं तीर चलाते
गिरते को हैं और गिराते
अपने अवगुण सभी छुपाते
केवल ईर्ष्या भाव यहाँ है
धन पद का ही चाव यहाँ है
तन-धन-पद में “ज्ञायक” तो है खो गया
सदाचार-वात्सल्य कहाँ पर खो गया?

नाम-मान को दान हैं देते
पद पाकर मालिक बन जाते
धर्म प्रचार का नाम है देते
बस अपना ही यश फैलाते
निर्माल्य का भक्षण करते
पापों से जो कभी ना डरते
निर्वांछक का भाव कहीं पर खो गया?
सदाचार-वात्सल्य कहाँ पर खो गया?

श्रावक-मुनि आचार शिथिल है,
तन उज्ज्वल अरु चित्त कुटिल है,
निज-दोषों को ना स्वीकारें
जो बतलाए उसको मारें,
कोई केवल चर्चा में रत,
कोई तत्वज्ञान से विरहित
“आत्मधर्म का मर्म” कहीं पर खो गया
सदाचार-वात्सल्य कहाँ पर खो गया?

प्रस्तुति समर्पण

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