आवे अहो ! निर्ग्रन्थ दशा, धन्य घड़ी कब होगी प्रभो | ave aho nirgrantha dasha dhanya gha di kaba hogi prabho

तर्जः जिनवाणी हमारी हीरा जड़ी…

आवे अहो ! निर्ग्रन्थ दशा, धन्य घड़ी कब होगी प्रभो ।। टेक।।

काल अनादि से मोह के वश हो।
विषय सुखों में व्यर्थ फँसा ।।
लेश नहीं पाया सुख क्षण भी ।
चतुर्गति दुःख माँहि धँसा।। 1।।

महाभाग्य पाया जिनशासन ।
आस्वादा निज-आनन्द रसा।।
रस नीरस तब लागे सबही ।
निज स्वाभाविक रूप लखा ।। 2 ।।

अपनी अद्भुत प्रभुता देखी।
निज वैभव निज में विकसा।।
मुक्ति का साम्राज्य सु पाने ।
उर में उछला आत्म रसा।। 3।।

हुई उदासी बाह्य जगत् से ।
भोगों में वीभत्स रसा ।।
अपनी अनुपम शोभा लखकर ।
प्रगटा उर श्रृंगार रसा।। 4।।

धीर वीर गम्भीर हुआ मन ।
गुरुओं का सानिध्य रुचा।।
हौंस जगी जिनमुद्रा धरने ।
रोम-रोम मेरा उलसा।। 5।।

मंगलमय मुनिधर्म सुपाऊँ।
होवे निश्चल ध्यान दशा।।
क्षपक श्रेणि चढ़ि कर्म निवारूँ ।
प्रगट होय अरहंत दशा।। 6।।

योग रहित हो शिवपद पाऊँ ।
दुःखमय आवागमन नशा ।।
काल अनंत रहूँ ज्यों का त्यों।
ध्रुव स्वाभाविक पद विलसा।। 7।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २१० से २११
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’

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