आज मेरे प्रगट्यो है आनन्द अनंत ।। टेक ।।
मंगल तीर्थक्षेत्र पर आकर, शाश्वत तीर्थ लखंत।
शुद्धातम ही सहज तीर्थ है, जिससे तीर्थ प्रकटन्त ।। 1।।
‘आत्मा हूँ’ श्रद्धा सम्यग्दर्शन, ज्ञान है प्रत्यक्ष करन्त।
आत्म में थिरता सम्यक्चारित्र, रत्नत्रय तीर्थ जयवन्त।। 2 ।।
ऐसो भाव तीर्थ जिन प्रगट्यो, ते जहँ चरण धरन्त।
क्षेत्र वही शुभ तीर्थ कहावे, भविजन वन्दन करन्त।। 3।।
शाश्वत तीर्थ निजात्म पिछानो, जीवन सफल भवन्त।
मुक्ति पाऊँ ये विकल्प भी, जामें नहीं उपजन्त।। 4।।
स्थिरता रूप मैं मुक्त सदा हूँ, महिमा को आवे न अन्त ।
निर्विकल्प हो निज में ही, अब निश्चय वन्दन करन्त।। 5 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३००
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’