वन्दों नित आचार्य मुनीश्वर, सर्व संघ नायक ऋद्धीश्वर ।। टेक ।।
सहज विरागी शुद्धोपयोगी, जयवंतें अनुभव रस भोगी ।। 1 ।।
द्वादश तप, दश धर्म सुहावे, पंचाचार सहज पल जावें ।। 2 ।।
षट् आवश्यक अरु गुप्ति त्रय, छत्तीस गुण धारक आचारज की जय ।। 3 ।।
दें दीक्षा-शिक्षा सुखकारी, प्राणीमात्र प्रति करुणा धारी।। 4 ।।
दोष लगे प्रायश्चित बतावें, धर्म तीर्थ निर्दोष चलावें ।। 5 ।।
लेश नहीं जिनके आडम्बर, यथाजात जिन रूप दिगम्बर ।। 6 ।।
परीषह अरु उपसर्ग सु आवें, गुरु किंचित् भी नहीं चिगावें ।। 7 ।।
अल्पकाल में कर्म नशावें, निश्चय ही शिव पदवी पावें ।। 8 ।।
प्रचुर स्व-संवेदनमय जीवन, भाव नमन गुरुवर के चरणन ।। ९ ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २३९
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’