तर्ज : ओ बसन्ती पवन पागल
ओ जगत् के शांतिदाता, शान्ति जिनेश्वर जय हो तेरी ऽऽ ।। टेक ।।
ओ जगत् के शांतिदाता …
मोह माया में फँसा, तुझको भी पहिचाना नहीं,
ज्ञान है ना ध्यान दिल में, धर्म को जाना नहीं ।
दो सहारा मुक्तिदाता, शान्ति जिनेश्वर जय हो तेरी ऽऽ ।। 1 ।।
ओ जगत् के शांतिदाता …
बन के सेवक हम खड़े हैं, आज तेरे द्वार पे,
हो कृपा जिनवर तो बेडा, पार हो संसार में ।
तेरे गुण स्वामी मैं गाता, शान्ति जिनेश्वर जय हो तेरी ऽऽ ।। 2 ।।
ओ जगत् के शांतिदाता …
किसको मैं अपना कहूँ, कोई नजर आता नहीं,
इस जहाँ में आप बिन, कोई भी मन भाता नहीं ।
तुम ही हो त्रिभुवन विधाता, शान्ति जिनेश्वर जय हो तेरी ऽऽ ।।३।।
ओ जगत् के शांतिदाता …
श्रद्धेय बाबूजी की कलम से…
पैसों से चिपकोगे तो पैसा टूट जायेगा,
हवा को बाँधोगे तो दम घुट जायेगा ।
आती उन्मुक्त मृत्यु तत्क्षण आ जाने दो,
मृत्यु को जो रोकेगा तत्क्षण मट जायेगा ॥
स्रोत: जिनवर भक्ति शतक (सामूहिक जिनेन्द्र पूजन समिति, कोटा)
संकलन: विक्रान्त कुमार जैन · सम्पादन: डॉ. वैद्य दीपक जैन