आत्म-पुरुषार्थ | atma purushartha

पुरुषार्थ किए ना हमने कभी, अवसर यूँ ही विलगाए हैं।

मुक्ति की अभिलाषा तो की, उपलब्ध नहीं कर पाये हैं ।। टेक ।।

सच्चे देव-शास्त्र-गुरु दर्शन, मंजिल के प्रारम्भ हैं ये।
निज स्वभाव के सन्मुख दृष्टि, मुक्ति का आरम्भ है ये ।।
गति रहते गतिहीन हुए हम, आगे ना बढ़ पाये हैं।। 1।।

परम्परा का धर्म दे रहा, लौकिक सुख का दान हमें।
समरूप उन्हीं का इस अन्तर में, पूज रहे हम लोग जिन्हें ।।
साध्य सराहा कभी न अपना, साधन गले लगाये हैं।। 2।।

चारों मंगल माने महान् पर, ये शाश्वत सुख जनक नहीं।
आराधक के मार्ग प्रकाशक निश्चय ये ही आराध्य नहीं ।।
चैतन्य ध्रुव में सच्चा सुख, श्रद्धान नहीं कर पाये हैं।। 3।।

पर्यायों में उलझ गये हम, आत्म रसिक न बन पाये।
विषयों में ही मंडराये हम, आत्म रसिक न बन पाये ।।
स्व-शक्ति हम भूल गये, कमलों से निकस न पाये हैं।। 4 ।।

पूजा पुण्य दिलाती है, अनुकरण मुक्ति दिलवाता है।
पैठ गया जो खुद के अन्दर, सहज मुक्ति पा जाता है ।।
खुद ही खुद को विसराये, खुद में खुद को भरमाये हैं।। 5 ।।

मुक्ति की युक्ति अन्दर है, मोक्षमार्ग अन्यत्र नहीं।
निज की शक्ति निज में सोई, हो पाई अभिव्यक्त नहीं ।।
उलझ गई पर में दृष्टि, निज प्रभुता ना लख पाये हैं।। 6।।

संयोग और पर्याय बदलती, ये अनादि का परिवर्तन ।
बहुत छके इसमें रच-पच, अब दूर रहे यह दुर्वेदन।।
ध्यान करें सम्मान करें, जिस आतम को विसराये हैं।। 7।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३३१ से ३३२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’