ओ मेरे मन, जिनवाणी सुन।
आनन्द का धाम, स्वयं आतमराम, स्वयं आतमराम ।। टेक ।।
बाहर में व्यर्थ ही भटके, पुण्योदय में अटके।
ये सब विनाशीक हैं, निज को समझ ले तू अब के ।। 1 ।।
चहुँगति में स्वामी है ठोकर,स्वयं ही नादान होकर।
आज है अवसर आया, सुख पाओ सु स्वाधीन होकर ।। 2 ।।
शक्तियाँ अनंत उछलतीं, मुक्ति किल्लोलें करती।
अहो ! आत्म वैभव अनुपम, जहाँ प्रभुता अनन्त विलसती ।। 3 ।।
अहो ! महिमा है अपरम्पार, तीन भुवन में सार।
पर से निरपेक्ष शाश्वत प्रभो, आज ज्ञायक स्व तत्त्व निहार ।। 4 ।।
तृप्ति निज में स्वयं ही तू पाये, त्रैलोक्य नाथ कहाये।
कर्मों का नाश होवे स्वयं ही, मुक्ति प्रकटे, न फिर भव में आये ।। 5 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १५३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’