अकर्त्ता ज्ञातारूप अहो, आत्मा ज्ञातारूप अहो ।। टेक ।।
सहज स्वभाव से ही आनंदमय, निर्द्वन्दरूप अहो।
निर्विकार निष्काम निरामय, ब्रह्मस्वरूप अहो ।। अकर्त्ता. ।।१।।
नित्य निरंजन नित निरूपाधि, परम पवित्र अहो।
चित्र-विचित्र अनंत गुणात्मक, तदपि अचित्र अहो।। अकर्त्ता. ।।२।।
पर का संग अनादिकाल से, नहीं पर रूप सु हो।
वैभाविक परिणति भी वर्ते, फिर भी शुद्ध अहो।। अकर्त्ता. ।।३।।
विन्मूरति चिन्मूरति अनुपम, परम ज्योतिमय हो।
निज से निज में सहज अनुभवो निर्ग्रन्थ रूप अहो।। अकर्त्ता. ।।४।।
नहीं तादात्म्य कभी हो पर से, कर्त्ता कैसे हो ?
सोचो समझो चेतो चेतन, ज्ञाता सहज रहो ।। अकर्त्ता. ।।५।।
ज्ञाता ही स्वाधीन निराकुल,ज्ञाता मुक्त अहो।
ज्ञाता ही परमानंदमय हो, ज्ञाता ही प्रभु हो।।अकर्त्ता. ।।६।।
ज्ञाता ही समता को धारे, ज्ञाता ध्याता हो।
ज्ञाता ही भव-बन्ध नशावे, शिवपद स्वामी हो।। अकर्त्ता. ।।७।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’