आरती श्री वर्द्धमान (कविवर द्यानतराय) | Aarti Shri Vardhaman (Kavivar Dyanatrai)

आरती श्री वर्द्धमान (कविवर द्यानतराय) | Aarti Shri Vardhaman (Kavivar Dyanatrai)

करो आरती वर्द्धमानकी । पावापुर निरवान थानकी । टेक ।
राग-विना सब जगजन तारें । द्वेष विना सब कर्म विदारें ।।
शील-धुरंधर शिव-तिय भोगी । मन-वच-कायन कहिये योगी ।
करो० ।।२।।

रतनत्रय निधि परिग्रह-हारी । ज्ञानसुधा-भोजनव्रतधारी ।।
करो० ।।३।।

लोक अलोक व्यापै निजमाहीं । सुखमय इंद्रिय सुखदुखनाहीं ।
करो० ।।४।।

पंचकल्याणकपूज्य विरागी । विमल दिगंवर अंवर-त्यागी ।।
करो० ।।५।।

गुनमनि-भूषन भूषित स्वामी । जगत् उदास जगंतर स्वामी ।।
करो० ।।६।।

कहै कहा लौं तुम सबजानो ।'द्यानत’की अभिलाष प्रमानो ।।
करो० ।।७।।


Artist: कविवर द्यानतराय
स्रोत: पूजन-पाठ-प्रदीप (सातवां संस्करण, देहली), पृष्ठ ४३७

खोज: Arti Shri Vardhaman

अर्थ

मैं भगवान वर्द्धमान की/तीर्थंकर महावोर की आरती करता हूँ जिनका निर्वाणस्थान पावांपुर है।

मैं उन भगवान वर्द्धमान की आरती करता हूँ जिन्होंने रागरहित/राग-शून्य होकर मैत्री भावना और करुणा से जगत के प्राणियों को संसार से/भव-भ्रमण से छूटने का उपाय बताया; जिन्होंने द्वेषरहित होकर सब कर्मों का नाश किया।

मैं उन भगवान वर्द्धमान की आरती करता हूँ जिन्होंने ब्रह्मचर्या में रत होकर शील का दृढ़ता से पालन किया; जिन्होंने मन-वचन और काय की एकाग्रता कर योग धारण किया, गुप्ति का पालन किया और मोक्षरूपी लक्ष्मी का वरण किया।

जिन्होंने सब परिग्रह को छोड़कर रत्नत्रय निधि (सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित) को धारण किया, जिन्होंने ज्ञानरूपी अमृत का भोजन किया अर्थात् सर्वोच्च ज्ञान प्राप्त किया।

जिन्होंने सर्वज्ञ होकर लोक और अलोक को अपने में ही दर्पणवत् धारण

किया है। जिन्होंने इन्द्रिय विषयों के सुख-दुःखों को छोड़कर अनन्त सुख को धारण किया है। उनकी गर्भ-जन्म तप ज्ञान और मोक्ष ये पाँचों घटनाएँ/स्थितियाँ जगत के प्राणियों का कल्याण करनेवाली हैं, इसलिए पूज्य हैं। वे विरागी हैं, राग-द्वेषरहित हैं। उन्होंने सब वस्त्र, वैभव आदि सब परिग्रह छोड़कर दिशाएँ ही जिनका वस्त्र है ऐसा नग्न दिगम्बर वेश धारण किया।

स्रोत: द्यानत भजन सौरभ।

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