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कुल 132 भजन
य (20)
- यह तन जंगम रूखड़ा, सुनियो भवि प्रानी
- यह मजा हमको मिला पुद्गल की यारी में
- यह मोह उदय दुख पावै
- यही इक धर्ममूल है मीता!
- यही है महावीर-संदेश
- या ऋतु धनि मुनिराई करत तप
- या चेतन की सब सुधि गई
- या नित चितवो उठिकै भोर
- यारी कीजै साधो नाल
- ये दिन आछे लहे जी लहे जी
- ये दिन मत विवेक बिन खोओ
- ये दिन हम विवेक बिन खोये
- ये धरम है आतम ज्ञानी का
- ये धर्म हमारा है
- ये प्रण है हमारा, ना जन्में दुबारा
- ये महा महोत्सव मंगलमय सुहावना
- ये महामहोत्सव पंच कल्याणक
- ये मोह महा दुःख खान
- ये शाश्वत सुख का प्याला
- ये समयसार सुनाया गया है
र (31)
- रंग मा रंग मा
- रंग लाग्यो महावीर थारो
- रक्षाबंधन पर्व पर तुम, रक्षा का संकल्प करो
- रक्षाबंधन संवाद (बहिन से)
- रक्षाबंधन संवाद (भाई से)
- रखता नहीं तन की खबर
- रचा सिद्धचक्र मण्डल विधान, प्रभु की पूजा करें
- रटि रसना मेरी ऋषभ जिनन्द
- रत्नत्रय ही शिव स्वरूप शिव का साधन
- रत्नत्रय ही सच्चा धन है, भव्य कमाओ अंतर में
- रहूँ जंगल में एकाकी, स्वयं में तृप्त आनंदमय
- (राग भैरवी)
- राची रह्यो परमाही
- राज जग का मिले, धर्म तेरा मिले
- राजुल वैराग्य
- राम भरतसों कहैं सुभाइ, राज भोगवो थिर मन लाइ
- रिमी झिमी उड़ी रे गुलाल
- री चल बंदिये चल बंदिये, री , महावीर जिनराय
- री ! मेरे घट ज्ञान घना मम छायो
- रे जिय ! काहे क्रोध करै
- रे जिय! जनम लाहो लेह
- रे भाई! मोह महा दुखदाता
- रे मन! कर सदा संतोष
- रे मन ! भज भज दीनदयाल
- रे मन भज ले प्रभु का नाम
- रे मन मेरा, तू मेरो कह्यौ मान मान रे
- रेल चली भई रेल चली
- रोम रोम में बसा है, जिनवर रूप तुम्हारा
- रोम-रोम पुलकित
- रोम-रोम में नेमि कुंवर के
- रोम-रोम से निकले
ल (22)
- लक्ष्य बिन्दु का कभी न
- लख जिनरूप सहज सुख पायो
- लखकर मूरति जिनवर की, म्हारें आनन्द उर न समाय जी
- लखो जी या जिय भोरे की बातैं, नित करत अहित हित घातैं
- लगन जिन चरणों में लागी
- लगन सु मेरे एकहि लागी, ध्याऊँ आतमराम को
- लगनी लागी आतम की निज घर करने वास
- लगनी लागी शुद्धातम सों, संयोग मात्र ना देखूँ
- लगी लो नाभिनंदन सों
- लगी लौं नाभिनंदनसों
- लहर लहर लहराये केसरिया झंडा
- लहरायेगा-लहरायेगा झंडा
- लाग रह्यो मन चेतनसों जी
- लागा आतमसों नेहरा
- लाल कैसे जावोगे, असरनसरन कृपाल
- लिया आज प्रभु जी ने जनम सखी
- लिया ऋषभदेव अवतार, निरत
- लिया प्रभू अवतार जयजयकार
- लुटेरे बहुत देखे हैं मगर तुमसा नही देखा
- लो दशलक्षण का पर्व आ गया
- लोकोत्तर माता सुखकारी, जिनवाणी पायी अविकारी
- लोभ तजो दुःखदायी
व (59)
- वंदन हम करते हैं मंगलमय
- वंदन है उन मुनिवर को
- वनवासी सन्तों को नित
- वन्दों अद्भुत चन्द्रवीर जिन
- वर्तमान को वर्धमान की
- वर्धमान ललना से कहे
- वह शक्ति हमें दो दया निधे
- वा पुरके वारणैं जाऊँ
- वानी सुनि मन कैं हरष अपार
- वामा घर बजत बधाई, चलि देखि री माई
- वाराणसी में गर्भ कल्याणक
- वारी हो बधाई या शुभ साजै
- विजय करो-विजय करो, कर्मोंदय पर विजय करो
- विपतिमें धर धीर
- विराजें शान्तिनाथ भगवान
- विराजै ‘रामायण’ घटमाहिं
- विश्व का कोलाहल कर दूर बनूँ मैं एकाकी एकान्त
- विश्व तीर्थ बड़ा प्यारा अजब है
- विषय भोग में तूने अय जिया कैसे जीको अपने लगा दिया
- विषयन में मन न जा न जा
- विषयों की तृष्णा को छोड़ के
- विषयों से दामन बचाते चलो
- विषयोंदा मद भानै, ऐसा है कोई वे
- वीतराग रूप देखा, भवतापहारी
- वीतरागता की ओर बढ़ रहे हैं ये चरण
- वीतरागता की पोषक अरु, श्री जिनमुख से हो उद्भूत
- वीतरागी देव तुम्हारे
- वीतरागी प्रभु तेरी अद्भुत छवि
- वीतरागी प्रभो देखो
- वीर गये निर्वाण चलिए उत्सव में
- वीर जिनेश्वर, अब तो मुझको मुक्ति महल
- वीर जिनेश्वर ! अब तो मुझको, मुक्तिमार्ग बतलाओ
- वीर जिनेश्वर, वीरपना प्रगटाऊँ
- वीर प्रभु का है कहना
- वीर प्रभु के गुण गाओ
- वीर प्रभु के ये बोल
- वीर प्रभु के शुभ शासन में
- वीर बनेंगे, महावीर बनेंगे, महावीर बनेंगे, महावीर बनेंगे
- वीर भज ले रे भाया
- वीर भज ले, वीर भज ले
- वीर महा महावीर जिनेसुर
- वीर वाणी बरसे रे, धर्मलाभ लई लो
- वीरजी हमारे कुण्डलपुर वारे
- वीरनाथ के दर्शन करके अति हर्षाये
- वीर-हिमाचल तें निकसी
- वे कोई अजब तमासा देख्या बीच जहान वे, जोर तमासा सुपनेका सा
- वे कोई निपट अनारी, देख्या आतमराम
- वे परमादी! तैं आतमराम न जान्यो
- वे प्राणी ! सुज्ञानी, जिन जानी
- वे मुनिवर कब मिलि हैं
- वे साधौं जन गाई
- वेष दिगम्बर धार, चले हैं मुनि
- वैदेहीनाथ सीमंधर, विराजो मेरे अन्तर में
- वैभव से वैराग्य
- वैराग्य का धन संग ले अपार
- वैराग्य भावना (वज्रनाभि चक्रवर्ती)
- वैराग्य भावों का लेके आधार
- वो जिनवाणी की मीठी लोरियाँ
- व्यर्थ भटको नहीं, भव्य मानो कही