लगी लौं नाभिनंदन सों।
जपत जेम चकोर चकई, चन्द भरता को ॥ टेक ॥
जाउ तन-धन जाउ जोवन, प्रान जाउ न क्यों।
एक प्रभु की भक्ति मेरे, रहो ज्यों की त्यों ॥1 ॥
और देव अनेक सेवे, कछु न पायो हौं।
ज्ञान खोयो गाँठिको, धन करत कुवनिज ज्यों ॥2॥
पुत्र-मित्र कलत्र ये सब, सगे अपनी गों।
नरक कूप उद्धरन श्रीजिन, समझ ‘भूधर’ यों ॥3॥
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन