ये सर्वसृष्टि है नाट्यशाला
ये सर्वसृष्टि है नाट्यशाला, ये कर्म अभिनव दिखा रहा है ।
मनुष्य जीवन का बना के नाटक, मनुष्य को ही नचा रहा है ॥टेक॥
छहों ऋतु और चारों गति में, बने है जिनके ये दृश्य सारे ।
जनम मरण की लगाई फेरी, जो आ रहा है वो जा रहा है ॥ये…१॥
कभी उदासी कभी विलासी, कभी है डाकू कभी है साधु ।
किसी का जीवन बिगड़ रहा है, किसी का जीवन सुधर रहा है ॥ये…२॥
हँसाये सुख के सुना के गाने, रुलाये दुख के सुना के गाने ।
मगर ये कोई नही समझता, कि कर्म गति ये बहा रहा है ॥ये…३॥
विचित्र नाटक है जिंदगी का, विचित्र है इसके दृश्य तीन ।
बना के नाटक अवस्थाओं का, उमर का पर्दा गिरा रहा है ॥ये…४॥
स्रोत: nikkyjain.github.io (अध्यात्म भजन)
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