विश्व का कोलाहल कर दूर बनूँ मैं एकाकी एकान्त
विश्व का कोलाहल कर दूर बनूँ मैं एकाकी एकान्त ।
चाह हो आत्म का उद्धार बनूँ में शान्त प्रशान्त-सुशान्त ॥१॥
जगत सागर में गोते खाय बिगोये मैंने जन्म अनन्त ।
भावना नहीं हृदय में जगी करूँ कब इन कर्मों का अन्त ॥२॥
जगत में बैरी मिले अनेक निभाई अपनी-अपनी टेक ।
टेक में जीवन दिया बिताय न कीना मैं आत्म विवेक ॥३॥
तर्क से खंडन मंडन किया विहंडन किया न पापाचार ।
चार दिन के जीने के लिये बनाया निज जीवन ही भार ॥४॥
भार जब असहनीय हो गया जरापन की जब आई बाढ़।
बाढ़ ने बना दिया कंकाल काल, बैठा अब आसन मांढ ॥५॥
आत्म अब भी है समय विचार छोड़ सब जग के दुर्व्यवहार ।
बना निज जीवन शान्ताकार चन्द्र जिससे हो बेडापार ॥६॥
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ५३ (विभिन्न कवियों के भजन)