जो आशाके दास हैं, वे समस्त संसारके दास हैं और जिन्होंने आशा पर विजय प्राप्त कर ली है, संसार उनकी सेवाके लिए उपस्थित रहता है। आशाकी दासता और आशा-विजय ये दोनों विभिन्न वस्तुएं हैं और इनके परिणाम भी जुदे-जुदे हैं, जैसा कि कविने अपनी एक उल्लिखित सूक्तिमें निर्देश किया है। आशाकी ज्वाला इतनी प्रबल और उद्दाम है कि मनुष्यका इस ओर झुकाव होते ही वह इसके लपेटोंसे आक्रान्त हो जाता है और अपना सर्वस्व खो बैठता है। इसके विपरीत जीवनमें वही सफलता प्राप्त कर सके हैं जो आशाके वशवर्ती न होकर संतोषके पथपर अग्रसर हुए हैं। जीवनका सुख संतोषमें है, परन्तु मनमें जबतक लोभ और आशाकी अणुमात्र भी वासना जागृत रहेगी मानव सुखी नहीं हो सकता । महाकवि बनारसीदास यहाँ मनको संतोषके पथपर प्रयाण करनेका ही उद्बोधन कर रहे हैं। उनका सहज व्यक्त उद्बोधन देखिएः-अरे मन, तू सदैव संतोष धारण कर। तुझे मालूम नहीं, इस संतोषक आश्रयसे ही संसारके समस्त दुःख और दोष दर होते हैं। रे मन, तू सदैव संतोष धारण कर ।
बढ़त परिग्रह मोह बाढत, अधिक तिसना होति ।
परिग्रहके बढ़नेसे मोह बढ़ता है और मोहके बढ़नसे तृष्णा बढ़ती है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार अग्निमें अधिक ईंधनके डालनसे उसकी ज्वाला और अधिक ऊँची होती जाती है । रे मन, तू सदैव संतोष धारण कर ।
लोभ लालच मूढ़ जन सो, कहत कंचन दान ।
मानव परिग्रह-संचय करके सुवर्णका दान करता है और कहता है हमारे परिग्रहमें कौन-सा पाप है, हम तो ऐसा करके सुवर्ण-दानतक करते हैं, परन्तु यह मूर्ख परिग्रह-संचयके पृष्ठवर्ती लोभ और लालचकी सीमा पर कुछ भी विचार नहीं करता, जिसकी प्रेरणासे यह परिग्रह संचित किया जाता है। इसके अतिरिक्त इस संचयकी आत्तिमें जो यह अहर्निश निमग्न रहता है और इस प्रकार जिस धर्म-धनकी हानि उठाता है, उस ओर तो इसका ध्यान ही नहीं जाता । रे मन, तू सदैव संतोष धारण कर ।
नारकिनके पाइ सेवत, सकुच मानत संक ।
मूढ़ मानव आशाके पीछे नारकियोंके - अन्यायी घनियोंके पैर पूजता है और उनकी गुलामी करता है और अपनको दीन समझकर सदैव संकोच करता है और संदिग्ध बना रहता है। इसे इतना आत्म-भान नहीं हो पाता कि प्रत्येक जीवात्माके अन्दर अनन्त ज्ञान और शान्तिका पुंज छिपा हुआ है और वह संसारमें सब कुछ कर सकता है । रे मन, तू सदैव संतोष धारण कर ।