रक्षाबंधन पर्व पर तुम, रक्षा का संकल्प करो।
जिनवाणी का मर्म समझकर, मोह अंधेरा दूर करो ॥ टेक ॥
तत्त्वों का सम्यक् निश्चय कर, प्रगटाओ अब भेद-विज्ञान।
अन्तर्मुख हो करो स्वानुभव, होय सहज सम्यक् श्रद्धान ॥ 1 ॥
भाओ नित वैराग्य भावना, उत्तम संयम ग्रहण करो।
नेत्र समान सावधानी से, रक्षा करना संयम की ॥ 2 ॥
दोष न लगने पावे कोई, नहीं परवाह करो जग की।
तन से भी निर्मम होकर तुम, निर्मल आतम ध्यान करो ॥3॥
धन्य अकम्पन आदि मुनीश्वर, अद्भुत समता भाव रखा।
लक्ष्य किया नहीं उपसर्गों का, अपना ज्ञायक रूप लखा ॥4॥
वे गुरु हैं आदर्श हमारे, सम्यक् समता भाव धरा।
निज तन सम ही रक्षा करना, अपने प्रिय साधर्मी की ॥5॥
कभी उपेक्षा हो नहीं पावे, छोटे भी साधर्मी की।
विष्णु कुमार मुनीश्वर जैसा, वात्सल्य उर मांहि धरा ॥6॥
हर्ष भाव से सेवा भक्ति, करना अपने गुरुजन की।
संस्कार दे छोटों को भी, राह दिखाना शिव सुख की ॥ 7 ॥
वात्सल्य से ही प्रभावना, जिनशासन की सदा करो।
भाओ अविरल तत्त्व भावना, किंचित् हो न विराधना ॥৪॥
हो निशंक स्वाश्रय से ही अब, करो सहज आराधना ।
उत्तम अवसर चूक न जाना, कर्म कालिमा दूर करो ॥9॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३०८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’