रत्नत्रय ही सच्चा धन है, भव्य कमाओ अंतर में | ratnatraya hi sachcha dhana hai bhavya kamao amtara mem

रत्नत्रय ही सच्चा धन है, भव्य कमाओ अंतर में।

महाभाग्य जिनशासन पाया, भव्य कमाओ अंतर में ॥ टेक ॥
देखो रत्नत्रय के धारक, श्री मुनिवर हैं महासुखी।
रत्नत्रय की हुई पूर्णता, श्री जिनवर हैं परम सुखी ॥
रत्नत्रय धारक श्रावक भी हैं, संतोषी सहज सुखी।
रत्नत्रय के बिना जगत के, जीव अज्ञानी सदा दुःखी ॥
रत्नत्रय ही अक्षय वैभव, भविजन पाओ अंतर में ॥ 1 ॥

बाह्य विभूति तो नश्वर है, तृष्णा अरु मद उपजाती।
अति संक्लेश रहे भावों में, भव-भव में नित भरमाती ॥
अतः ज्ञानियों ने जड़ वैभव, तृण सम क्षण भर में छोड़ा।
सारभूत निज शुद्धातम में, निज उपयोग सहज जोड़ा ॥
गुण अनंतमय वैभव पाया, अविनाशी निज अंतर में ॥ 2 ॥

सम्यग्दर्शन मूल धर्म का, सम्यग्ज्ञान प्रकाशक है।
चारित्र ही साक्षात् धर्म है, सर्व दुःखों का नाशक है ॥
वीतराग सर्वज्ञ देव, अरु गुरु निर्ग्रन्थ अहिंसा धर्म।
स्याद्वादमय श्री जिनवाणी, समझो सहज तत्त्व का मर्म ॥
भेदज्ञान कर करो स्वानुभव, मुक्तिमार्ग है अंतर में ॥ 3 ॥

आत्मन् ! बाहर सुख न मिलेगा, व्यर्थ न भटकाओ मन को।
ज्ञानाभ्यास करो मनमाँहि, मिथ्या मोह तजो पर को॥
निज पद भाओ निज पद ध्याओ, शिवपद सहज ही पाओगे।
तुम स्वभाव से हो परमातम, परमातम कहलाओगे ॥
निश्चय ही भगवान कह रहे, पाने योग्य है अंतर में ॥ 4 ॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’