लख जिनरूप सहज सुख पायो| Lakh jinrup sahaj sukh payo

dev
#1

(तर्ज : अब मेरे समकित सावन आयो…)

लख जिनरूप सहज सुख पायो, सुख पायो, अद्भुत सुख पायो।।
आत्मध्यानमय मुद्रा देखे, ध्येय रूप दरशायो । टेक।।

प्रभुवर दोष अठारह नाशे, अनंत चतुष्टय पायो।
समवशरण की रचना करके, सुर बहुमान जतायो ।।1।।

दिव्यध्वनि सुनकर जिनवर की, भविजन शिवपथ पायो।
श्री जिनशासन पाकर स्वामिन्, आनंद उर न समायो।2।।

धन्य जिनेश्वर अशरण जग में, आतम शरण बतायो।
हुआ सहज निश्चिंत शांत चित्त, साधक भाव जगायो ।।3।।

ध्याऊँ सतत स्वरूप आपनो, और न कछु सुहायो।
पाने योग्य स्वयं में पायो, सविनय शीश नवायो ।4।।

Artist: ब्र. श्री रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’

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