ओ भैया मेरे स्वानुभूति प्रकटाना, पाया है अवसर सुहाना-सुहाना ॥ टेक ॥
चिंतामणि सम जिनवृष पाया, फिर भी सेवे विषय-कषाया।
अब कुछ तो विवेक कराना-कराना ॥ 1 ॥
चेतो ! अवसर व्यर्थ न खोना, तत्त्वों का सत् निर्णय करना।
भेद-विज्ञान जगाना-जगाना ॥ 2 ॥
कर्म-राग-पर्याय से न्यारा, ज्ञायक प्रभु अनुपम सुखकारा।
निज में ही दृष्टि जमाना-जमाना ॥ 3 ॥
आत्म-भाव ही मुनि संघ है, मोहादिक बलि माना।
देवे दुःख मनमाना-मनमाना ॥ 4 ॥
मोहादिक को दूर भगाओ, सम्यग्दर्शन प्रकटाओ।
श्री गुरु विष्णु समाना-समाना ॥ 5॥
सम्यक् दर्शन-ज्ञान सहित हो, सम्यक् चारित्र पूर्ण करन को।
मुनि पद सहज धराना-धराना॥ 6 ॥
बाह्य उपसर्ग नहीं दुःख दाता, व्यर्थ विकल्पों से दुःख पाता।
निर्विकल्प हो जाना, हो जाना ॥7॥
जब तुम निज में ही ठहरोगे, कर्मादिक खुद ही भग जावें।
स्वयं सिद्ध पद पाना, हो पाना ॥৪॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’