ये आत्मा क्‍या रंग दिखाता नये नये | Ye Aatma Kya Rang Dikhata Naye Naye

ये आत्मा क्‍या रंग दिखाता नये नये

ये आत्मा क्‍या रंग, दिखाता नये नये ।
बहुरूपिया ज्यों भेष, बनाता नये नये ॥टेक॥

धरता है स्वांग देव का, स्वर्गों में जाय के ।
करता किलोल देवियों के, सँग नये नये ॥१॥

गर नर्क में गया तो, रूप नारकी धरा ।
लखि मार पीट भूख प्यास, दुख नये नये ॥२॥.

तिर्यञ्च में गज बाज वृषभ, महिष मृग अजा ।
धारे अनेक भांति के, काबिल नये नये ॥३॥

नर नारि नपुँसक बना, मानुष की योनि में ।
फल पुन्य पाप के उदय, पाता नये नये ॥४॥

‘मक्खन’ इसी प्रकार भेष, लाख चौरासी ।
धारे बिगारे बार बार, फिर नये नये ॥५॥


Artist: पं. मक्खनलाल जी
स्रोत: nikkyjain.github.io (पं मख्खनलाल कृत भजन)

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