यह तन जंगम रूखड़ा, सुनियो भवि प्रानी ।
एक बूंद इस बीच है, कछु बात न छानी ।।टेक।।
गरभ खेतमें मास नौ, निजरूप दुराया ।
बाल अंकुरा बढ़ गया, तब नजरों आया ।।१।।
अस्थिरसा भीतर भया, जानै सब कोई ।
चाम त्वचा ऊपर चढ़ी, देखो सब लोई ।।२।।
अधो अंग जिस पेड़ है, लख लेहु सयाना ।
भुज शाखा दल आँगुरी, दृग फूल रवाँना ।।३।।
वनिता बेलि सुहावनी, आलिंगन कीया ।
पुत्रादिक पंछी तहां, उड़ि वासा लिया ।।४।।
निरख विरख बहु सोहना, सबके मनमाना ।
स्वजन लोग छाया तकी, निज स्वारथ जाना ।।५।।
काम भोग फलसों फला, मन देखि लुभाया ।
चाखतके मीठे लगे, पीछैं पछताया ।।६।।
जरादि बलसों छवि घटी, किसही न सुहाया ।
काल अगनि जब लहलही, तब खोज न पाया ।।७।।
यह मानुष द्रुमकी दशा, हिरदै धरि लीजे ।
ज्यों हूवा त्यों जाय है, कछु जतन करीजे ।।८।।
धर्म सलिलसों सींचिकै, तप धूप दिखइये ।
सुरग मोक्ष फल तब लगैं, ‘भूधर’ सुख पइये ।।९।।
Artist: पं. श्री भूधरदास जी
स्रोत: भूधर भजन सौरभ, पृष्ठ १०३ से १०४