वह शक्ति हमें दो दया निधे, हम मोक्षमार्ग में लग जावें।
करि शुद्ध रत्नत्रय भेद त्याग, निज शुद्धातम में रमि जावें।। टेक।।
तज इष्टानिष्ट विकल्प सभी, समता रस निज में भरि लावें।
करि साम्यभाव स्वाभाविक परिणति, पाय उसी में रमि जावें।। 1 ।।
है गुण अनंतमय शुद्ध निजातम, शक्ति प्रगट कर दिखलावें।
फिर काल अनंता रहें उसी में, ज्ञाता-दृष्टा बन जावें।। 2 ।।
सब झलकें लोकालोक काल त्रय, परिणति निज में मिल जावे।
स्वाधीन निराकुल ज्ञान चन्द्रिका, आस्वादी हम बन जावें।। 3 ।।
— ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’