वीतरागी प्रभो देखो | Vitragi Prabho Dekho

वीतरागी प्रभो देखो, मुक्ति का मार्ग दिखलाते ।
आत्म सुख आत्मा में ही, अहो प्रत्यक्ष दरशाते ॥टेक
सभी संसार है दुःखमय, सार है एक शुद्धातम ।
भिन्न परभावों से आतम, समझ बन जायें परमातम ॥
अन्य कोई नहीं साधन, व्यर्थ ही मूढ़ भटकाते,
वीतरागी प्रभो देखो, मुक्ति का मार्ग दिखलाते ॥1॥

आस पर की अरे झूठी, शरण कोई नहीं जग में।
सार्थक हो तभी जीवन, लगें हम मुक्ति के मग में॥
धन्य हैं साधु निज उपयोग, सहज निज में ही रमाते।
वीतरागी प्रभो देखो, मुक्ति का मार्ग दिखलाते ॥2॥

हुए सन्तुष्ट हे खामी, शरण हम आपकी पाकर ।
शान्त मन हो गया जिनवर, पास में आपके आकर ॥ स
हज श्रद्धा से भक्ति से, शीस चरणों में नवाते ।
वीतरागी प्रभो देखो, मुक्ति का मार्ग दिखलाते ॥3॥l

Artist: बा० ब्र० रवीन्द्र जी आत्मन् , अमायन