विषय रस खारे, इन्हैं छाड़त क्यों नहि जीव | Vishay Ras Khare Inhain Chhadat Kyon Nahi Jeev

विषय रस खारे, इन्हैं छाड़त क्यों नहि जीव

विषय रस खारे, इन्हैं छाड़त क्यों नहि जीव ॥टेक॥

मात तात नारी सुत बांधव, मिल तोकू भरमाई ।
विषय भोग रस जाय नर्क तूं, तिलतिल खण्ड लहाई ॥
विषय रस खारे, इन्हैं छाड़त क्यों नहि जीव ॥१॥

मदोन्मत्त वस मरने कूं, कपट की हथनी बनाई ।
स्पर्शन इन्द्रिय बसि होके, आय पड़त गज खाई ॥
विषय रस खारे, इन्हैं छाड़त क्यों नहि जीव ॥२॥

रसना के बसि होकर मांछल, जाल मध्य उलझाई ।
भ्रमर कमल बिच मृत्यु लहत है, विषय नासिका पाई ॥
विषय रस खारे, इन्हैं छाड़त क्यों नहि जीव ॥३॥

दीपक लोय जरत, नैनू बसि, मृत्यु पतंग लहाई ।
कानन के बसि सर्प हाय के, पींजर मांहि रहाई ॥
विषय रस खारे, इन्हैं छाड़त क्यों नहि जीव ॥४॥

विष खायें ते इक भव मांहि, दुख पावै जीवाई ।
विषय जहर खाये तैं भव-भव, दुख पावै अधिकाई ॥
विषय रस खारे, इन्हैं छाड़त क्यों नहि जीव ॥५॥

एक-एक इन्द्री तैं यह दुख, सबकी कौन कहाई ।
यह उपदेश करत है पंडित, ‘महाचन्द्र’ सुख दाई ॥
विषय रस खारे, इन्हैं छाड़त क्यों नहि जीव ॥६॥


Artist: पं. बुध महाचंद्र जी
स्रोत: nikkyjain.github.io (पं बुध महाचन्द्र भजन)

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