कर्मकांड की बालू के, भूधर धसकने लगे,
सदियों से सिसकते मूल्य जीवन के उभरने लगे,
रंगे सियारों की खिसकने लगी रे! धरती
(रंगेसियार - धोखेबाज व्यक्ति)
स्वर्णपुरी क्षितिज पर सुवर्ण-पुरुष हँसने लगे।
जगत जिसके करिश्मे देखता ठगा सा रहा
‘जादूगर’ कोई बोला, जीवन पट बुनता रहा,
विदेह का पैगंबर खुदा की बातें करता
आँधी-सा आया तूफान सा चला गया।
रचयिता: श्री बाबू जुगलकिशोर जैन ‘युगल’ जी, कोटा
स्वर: स्वयं बाबू ‘युगल’ जी
प्रस्तुति: आचार्य कुन्दकुन्द फाउंडेशन, कोटा
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