रत्नत्रय ही शिव स्वरूप शिव का साधन।
शाश्वत सुख स्वरूप शुद्धातम आराधन ॥ 1 ॥
सुख-दुःख का पर से, कुछ भी सम्बन्ध नहीं।
बंध काल में भी शुद्धनय से बन्ध नहीं ॥ 2 ॥
स्वयं स्वयं को जाने बिन हैरान हुआ।
जिसने समझा, ध्याया वह भगवान हुआ ॥ ३॥
अज्ञानी तो पर को देता दोष सही।
ज्ञानी अपना दोष लखे परमार्थ यही ॥ 4 ॥
दोष छोड़ने का ही वह उद्यम करता।
परमातम निर्दोष हुए उनको भजता ॥ 5॥
गुरुओं की संगति में ज्ञानाभ्यास करें।
भेदज्ञान कर ध्रुव स्वभाव निर्दोष भजें ॥ ६॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’