व्यर्थ भटको नहीं, भव्य मानो कही | vyartha bhatako nahim bhavya mano kahi

तर्ज : भव्य मानो कही…

व्यर्थ भटको नहीं, भव्य मानो कही।

मुक्ति निज में मिले, भव्य मानो कही ।। टेक ।।

द्रव्य तो यूँ अनन्त भी लोक में,
परिणमन किन्तु करते स्वयं-स्वयं में।
साथी कोई किसी का न देखो सही।। 1।।

जिनको अपना कहें, छोड़ चल देते वे,
जिनकी आशा करें, काम आवें न वे।
मोह दुःखकार झूठा तजो, गुरु कही ।। 2।।

भिन्न क्यों तू स्वयं सहज भगवान है,
प्रभु सी प्रभुता धरे अनंत गुण खान है।
द्रव्यदृष्टि करो, भव्य सार यही ।। 3।।

पर में तृष्णा बढ़े, तृप्ति तो निज में ही,
पर में बंधन मिले, मुक्ति तो निज में ही।
ध्याओ शुद्धात्मा, पाओ अष्टम् मही ।। 4।।

आत्मध्यान ही तिहुँ लोक में सार है,
शेष सब दुःखमय जानो संसार है।
आत्मा को उपादेय आत्मा सही ।। 5।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’