तर्ज : लो स्वर्ण जयंती वर्ष आ गया
लो दशलक्षण का पर्व आ गया, दीप जला लो ज्ञान का।
अमृत बरसा दशधर्मों की, उत्तमता के ज्ञान का ।। टेक ।।
कर्म मेरा बस यही एक है, स्व-ज्ञायक के ज्ञान का।
क्षमा धर्म से होय ज्ञान, शत्रु मित्र समान का ।।1।।
बड़े पने से मोही जीव, करता पोषण मान का।
मार्दव धर्म से करे जीव फिर, खंडन अपने मान का ।।2।।
भोले-भाले जीव फँसाना, विषय है मायाचार का।
आर्जव धर्म को धार जीव, कपट छोड़े संसार का ।। 3 ।।
तृष्णावश हो लोभ करावे, परिभ्रमण संसार का।
शौच धर्म अपनाकर जीव, करे वरण शिवनार का ।।4।।
बोल-बोल कर झूठ करे है, मरण पाप की खान का ।
सत्य धर्म से मिले जीव को, सिंहासन ध्रुवधाम का ।।5।।
लो दशलक्षण का पर्व आ गया …
मन के सकल विकार दूर कर, मार्ग पकड़ कल्याण का ।
संयम धर्म से जीव पकड़ता, राह निजातम ध्यान का ।। 6 ।।
रोक आभ्यन्तर इच्छा लो, प्रण रत्नत्रय धार का।
तप धर्म से जीव करत है, तप द्वादश परकार का ।।7।।
बाह्यदान बतलाये श्रुत, औषध अभय आहार का।
त्याग धर्म से जीव तजे मल, राग अरु द्वेष विकार का ।।8।।
धर्म आकिंचन करे कार्य जब, परिग्रह के संहार का।
पद पाये तब सिद्धशिला पर, अविनाशी अविकार का ।। ९ ।।
ब्रह्मचर्य से त्यागे जीव, मैथुन सर्व प्रकार का।
निजस्वरूप में लीन होने में, ब्रह्मचर्य है सार का ।।10।।
लो दशलक्षण का पर्व आ गया …
स्रोत: जिनवर भक्ति शतक (सामूहिक जिनेन्द्र पूजन समिति, कोटा)
संकलन: विक्रान्त कुमार जैन · सम्पादन: डॉ. वैद्य दीपक जैन
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