विजय करो-विजय करो, कर्मोंदय पर विजय करो | vijaya karo vijaya karo karmomdaya para vijaya karo

विजय करो-विजय करो, कर्मोंदय पर विजय करो।

सहन करो-सहन करो, शान्त भाव से सहन करो ।। टेक।।

पुण्योदय लख फूल न जाओ, निज स्वभाव को भूल न जाओ।
अभिमानी उद्धत होकर तुम, नाहिं पापाचार करो।। 1।।

है अनित्य-अशरण पुण्योदय, ज्ञानोदय अक्षय सुखमय ।
तनिक विवेक हृदय में लाओ, उसका सदुपयोग करो।। 2।।

पापोदय में नहीं घबराओ, दैन्य भाव नहीं उर में लाओ।
प्रभु भक्ति में चित्त लगाओ, सम्यक् तत्त्व विचार करो।। 3।।

दुख से दुख तो नहीं मिटेगा, नहीं दूसरा बाँट सकेगा।
धारण करके धैर्य आत्मन्, निर्मल भेद-विज्ञान करो।। 4।।

पर से भिन्न सदा है ज्ञायक, सिद्ध स्वरूप सहज है ज्ञायक।
ज्ञायक तो बस ज्ञायक ही है, सहज रूप अनुभवन करो ।। 5 ।।

अहो ! निहारो उन पुरुषों को, सहजहिं जीता उपसर्गों को।
उन सम निश्चल आराधन कर, परम साध्य को प्राप्त करो ।। 6 ।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३६६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’