तर्ज : वीर भज ले रे भाया…
वीर बनेंगे, महावीर बनेंगे, महावीर बनेंगे, महावीर बनेंगे।। टेक ।।
वीर प्रभु का शासन पाया, अनन्त तीर्थमय आतम पाया।
वीतरागी मार्ग का श्रद्धान धरेंगे ।। 1 ।।
वीतराग जिनदेव जजेंगे, गुरु श्री निर्ग्रन्थ भजेंगे।
धर्म अहिंसा आचरण करेंगे।। 2 ।।
जिनवाणी नित ही अभ्यासें, वस्तु स्वरूप यथारथ भासे ।
तत्त्वों का सम्यक् ज्ञान करेंगे ।। 3 ।।
भूत-प्रेत से नहीं डरावें, नहीं विपत्ति में घबरावें।
निज-पर का भेद-विज्ञान करेंगे ।। 4 ।।
नहीं पुण्य में हम अटकेंगे, परम स्वानुभव रस गटकेंगे।
त्याग दुर्मोह को निर्मोही बनेंगे ।। 5 ।।
ज्ञायक रूप स्वयं को जानें, पर में इष्ट-अनिष्ट न ठानें।
उदासीन निज में ही तृप्त रहेंगे ।। 6 ।।
जग से कुछ भी आस नहीं है, भोगों की अभिलाष नहीं है।
स्वाधीन ब्रह्मचर्य धर्म धरेंगे ।। 7 ।।
समता धारें क्षोभ न लावें, निर्ग्रन्थ हो श्रेणी चढ़ जावें।
कर्म सर्व जीतकर मुक्ति वरेंगे ।। 8 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १२० से १२१
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’