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ये बोल रिकॉर्डिंग से मशीन द्वारा लिखे गए हैं, इनमें अशुद्धियाँ हो सकती हैं।
बीज राख फल भोगवे
ज्यों किसान जगमाय ।
त्यों चक्री नृप सुख करे
धर्म बिसारे नाय ॥
यह विधि राज काज नरनायक
भोगो पुण्य विशालो ।
सुख सागर में रमत निरंतर
जाते न जान्यो कालो ॥
एक दिवस शुभ कर्म संयोगे
छमंकर मुनि बंदे देखे ।
श्री गुरु के पद पंकज
लोचन अलियानंदे ॥
तीन प्रदक्षिण दे सिर नायो
कर पूजा स्तुति कीनी ।
साधु समीप बीन कर बैठे
चरनन में दृष्टि दीनी ॥
गुरु उपदेशो धर्म शिरोमणि
सुन राजा वैरागे ।
राज रमा बनी तादिक जे रस
सो रस नीरस लागे ॥
मुनि सूरज कथनी किरणावली
लगत भरम बोध भाजी ।
भवतन भोग सरूप विचारो
परम धरम अनुरागी ॥
यह संसार महाबन भीतर
भ्रमते ओर न आवे ।
जामन मरण जरा दो दाझै
जीव महा दुख पावे ॥
कबहुँ जाय नरकगति भुंजे
छेदन भेदन भारी ।
कबहुँ पशु परयाय धरे ता
बध बंधन भयकारी ॥
सुरगति में पर सम्पति देखे
राग उदय दुख होई ।
मानुष योनि अनेक विपत्ति में
सर्व सुखी नहिं कोई ॥
कोई इष्ट वियोगी बिलखै
कोई अनिष्ट संयोगी ।
कोई दीन दरिद्री बिगुचै
कोई तन को रोगी ॥
किसी के घर कलहारी नारी
के बैरी सम भाई ।
किसी ही के दुख बाहर दीखे
किसी उर दुचिताई ॥
कोई पुत्र बिना नित झूरे
होय मरे तब रोवे ।
खोटी संतति सों दुख उपजे
क्यों प्राणी सुख सोवे ॥
पुण्य उदय जिनके तिनके भी
नाहिं सदा सुख साता ।
ये जग वास जथारथ दीखे
सब दीखे दुखदाता ॥
जो संसार विषय सुख होतो
तीथंकर क्यों त्यागे ।
काहे को शिव साधन करते
संयम सों अनुरागे ॥
देह अपावन अठर घिनावनी
यामें सार न कोई ।
सागर के जल सों शुचि कीजे
तो भी शुद्ध न होई ॥
ओ
सप्त कुधातु भरी मल मूरत
चाम लपेटी सोहै ।
अंतर देखत असम जग में
और अपावन को है ॥
नव मल द्वार स्रवैं निसवासर
नाम लिये घिन आवे ।
व्याधि उपाधि अनेक जहाँ तहाँ
कौन सुधी सुख पावे ॥
पोषत तो दुख दोष करे अति
सो शठ सुख उपजावे ।
दुर्जन देह स्वभाव बराबर
मूरख प्रीति बढ़ावे ॥
राचन जोग स्वरूप न याको
बिरचन जोग सही है ।
यह तन पाय महातप कीजे
यामें सार यही है ॥
भोग बुरे भव रोग बढ़ावें
बैरी हैं जग जीके ।
बेरस होयं बिपाक समय अति
सेवत लागे नीके ॥
बज्र अगनि विष से विषधर से
ये अधिके दुखदाई ।
धर्म रतन के चोर चपल अति
दुर्गति पंथ सहाई ॥
मोह उदय यह जीव अज्ञानी
भोग भले कर जाने ।
ज्यों कोई जन तो खाय धतूरो
सो सब कंचन माने ॥
ज्यों ज्यों भोग संयोग मनोहर
मनवांछित जन पावे ।
तृष्णा नागिन ज्यों ज्यों डंके
अरे रे लहर जहर की आवे ॥
मैं चक्री पद पाय निरंतर
भोगे भोग घनेरे ।
तो भी तन के भये नाहीं पूरन
भोग मनोरथ मेरे ॥
राज समाज महा अघ कारण
बैर बढ़ावन हारा ।
बेस्या सम लक्ष्मी अति चंचल
याको कौन पतियारा ॥
मोहे महा रिपु बैर विचारयो
जग जिय संकट डारे ।
तन कारागृह अरे
बनता बेड़ी
परिजन जे न रखवारे ॥
ओहो सम्यक् दर्शन ज्ञान चरण तप
ये जिय के हितकारी ।
यही सार असार और सब
अरे रे सब संसार असार है, अरे एक सम्यक् दर्शन ज्ञान चारित्र यही तीन लोक में हितकारी हैं और कोई हितकारी नहीं है, अरे ।
यही सार असार और सब
यह चक्री चित धारी ।
छोड़े चौदह रत्न नवों निधि
अरु छोड़े संग साथी ॥
घोड़े अठारह कोरे छोड़े
चौरासी लख हाथी ।
इत्यादिक सम्पत बहुतेरी
जीरण तृण सम त्यागी ॥
नीत विचारयो नियोगी सुत तों
राज दियो बड़भागी ।
होय निशल्य अनेक नृपति संग
भूषण बसन उतारे ॥
श्री गुरु चरण धरि जिन मुद्रा
पंच महाव्रत धारे ।
धन्य है समझ सुबोध जग्यो तुम
धन्य है धीरज धारी ॥
ऐसी सम्पति छोड़ बसे बन
तिन पद धोक हमारी ।
परिग्रह पोट उतार सब
परिग्रह पोट उतार सब
लीनो चारित पंथ ।
निज सुभाव में थिर भए
ऐसे वज्रनाभि निरग्रंथ ॥
वज्रनाभि निरग्रंथ
जप सुख करे धर्म विचारे ना।
इह विधि राज करे नरनायक
भोगो पुण्य बिशालो
सुख सागर में भ्रमते निरंतर
जाते न जान्यो कालो
एक दिवस शुभ कर्म संयोगे
क्षेमंकर मुनि बंदे देखे
श्री गुरु के पद पंकज
लोचन अलि आनन्दे
तीन प्रदक्षिण दे सिर नायो
कर पूजा स्तुति कीनी
साधु समीप बिनय कर बैठे
चरनन में दृष्टि दीनी
साधु समीप बिनय कर बैठे
चरनन में दृष्टि दीनी
गुरु उपदेशो धर्म शिरोमणि
सुन राजा बैरागे
राज रमा बनितादिक जे रस
सो रस नीरस लागे
मुनि सूरज कथनी किरणावली
लगत भरम बोधि भाजी
भव तन भोग सरूप बिचारा
परम धरम अनुरागी
यह संसार महाबन भीतर
भ्रमतें ओर न आवे
जनम मरण जरा रोग दाझै
जीव महा दुख पावै ॥
कबहूँ जाय नरक गति भुंजे
छेदन भेदन भारी
कबहूँ पशु परजाय धरे ता
बध बंधन भयकारी
सुरगति में पर संपत्ति देखे
राग उदय दुख होई
मनुष्य योनि अनेक विपत्ति में
सर्व सुखी नहिं कोई
कोई इष्ट बियोगी बिलखै
कोई अनिष्ट संयोगी
कोई दीन दरिद्री बिगुचै
कोई तन का रोगी
किस ही के घर कलहारी नारी
के बैरी सम भाई
किस ही के दुख बाहर दीखे
किसी उर दुचिताई
कोई पुत्र बिन नित झूरै
होय मरे तब रोवै
खोटी संतति सों दुख उपजे
क्यों प्राणी सुख सोवै
पुण्य उदय जिन के तिन के भी
नाहिं सदा सुख साता
यह जग बास जथारथ दीखे
सब दीखे दुख दाता
जो संसार बिषय सुख हो तो
तीर्थंकर क्यों त्यागे
काहे को शिव साधन करते
संयम सों अनुरागे
देह अपावन अथिरे गिनावन
या में सार न कोई
सागर के जल सों सुचि कीजे
तो भी शुद्ध न होई हो
सप्त कुधातु भरी मल मूरत
चाम लपेटी सोहै
अंतर देखत असम जग में
और अपावन को है
नव मल द्वार स्रवै निसि बासर
नाम लिये घिन आवै
व्याधि उपाधि अनेक जहाँ तहाँ
कौन सुधी सुख पावै
पोषत तो दुख दोष करै अति
सोषत सुख उपजावै
दुर्जन देह स्वभाव बराबर
मूरख प्रीति बढ़ावै
राचन जोग स्वरूप न याको
बिरचन जोग सही है
यह तन पाय महातप कीजे
या में सार यही है
भोग बुरे भव रोग बढ़ावैं
बैरी हैं जग जी के
बेरस होयं बिपाक समय अति
सेवत लागे नीके
बज्र अगनि विष से विष दरसे
ये अधिके दुखदाई ॥
धर्म रतन के चोर चपल अति
दुर्गति पंथ सहाई
मोह उदय यह जीव अज्ञानी
भोग भले कर जाने
जो कोई जन तो खाय धतूरो
सो सब कंचन माने
ज्यों ज्यों भोग संयोग मनोहर
मनवांछित जन पावै
तृष्णा नागिन ज्यों ज्यों डंके
अरे रे लहर जहर की आवै
मैं चक्री पद पाय निरंतर
भोगे भोग घनेरे
तो भी तनिक भये नाहिं पूरन
भोग मनोरथ मेरे
राज समाज महा अघ कारण
बैर बढ़ावन हारा
बेश्या सम लक्ष्मी अति चंचल
याको कौन पतियारा
बेश्या सम लक्ष्मी
मोह महा रिपु बैर बिचारयो
जग जिय संकट डारे
तन कारागृह अरे
बनिता बेड़ी
परिजन जन रखवारे
ओ हो सम्यक् दर्शन ज्ञान चरन तप
ये जिय के हितकारी
ये ही सार असार और सब अरे रे सब संसार असार है रे। एक सम्यक् दर्शन ज्ञान चारित्र यही तीन लोक में हितकारी है और कोई हितकारी नहीं है रे। अरे!
ये ही सार, असार और सब, यह चक्री चित धारी।
छोड़े चौदह रत्न नवों निधि
अरु छोड़े संग साथी
कोड़े अठारह घोड़े छोड़े
चौरासी लख हाथी
इत्यादिक संपति बहुतेरी
जीरन तृण सम त्यागी
नित बिचार यौं नियोगी सुत को
राज दियो बड़भागी
होय निशल्य अनेक नृपति संग
भूषण बसन उतारे
श्री गुरु चरन धरी जिनमुद्रा
पंच महाव्रत धारे
धन्य है समझ सुबोधि जगोत्तम
धन्य है धीरज धारी
ऐसी सम्पति छोड़ बसे बन
तिन पद धोक हमारी
ऐसी सम्पति छोड़ बसे बन
तिन पद धोक हमारी
परिग्रह पोट उतार सब
परिग्रह पोट उतार सब
लीनो चारित पंथ
निज स्वभाव में थिर भये
ऐसे वज्रनाभि निरग्रन्थ
वज्रनाभि निरग्रन्थ ॥
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स्रोत: JinSwara ऑडियो संग्रह।