लक्ष्य बिन्दु का कभी न | Lakshya bindu ka kabhi naa

vairagya

#1

लक्ष्य बिन्दु का कभी न हम पता लगा सके।
खोजते रहे सदा, मगर न पंथ पा सके ॥ टेक॥

दिव्य देवगति मिलि जहाँ कि सुख अपार था।
फूल की सुगंधी सा सुदेवियों का प्यार था।
क्या वहाँ बहार थी कि क्या अजब खुमार था?
भोग वस्तुएँ अनेक भोगना भी भार था।
मुग्ध हो गया हृदय, बन गया कि ज्यों अभय।
भूल यह गया कि कालचक्र है नहीं सदय ॥
और एक दिन ढली वह खिली हुई कली।
दु:ख हुआ बहुत कि हम जरा नहीं अघा सके। 1॥

नर्क में गया कभी, जहाँ महान क्लेश था।
वेदना अपार थी, तथा विचित्र वेष था।
मार-काट-चीर-फाड़ से भरा प्रदेश था।
रक्त पीव माँस का समुद्र वह अशेष था।
दम लगा घुट-घुटा, प्राण भी लुटा-लुटा।
किन्तु पूर्ण आयु तक, उसी जगह रहा डटा॥
भूख भी न मर सकी, प्यास कब उभर सकी ?
ये बड़े चतुर न किन्तु कर्म को हटा सके। 2 ॥

पशु हुए कभी तो भार कर वहन सदा फिरे।।
हीन बल हुए तो आयु भर रहे डरे-डरे ॥
ज्ञान हीन जिन्दगी विकास किस तरह करें ?
बन्धनों के बीच घोर वेदना लिये मरे ।
पाप से घिरे -घिरे, पंक में गिरे-गिरे
साथ के निकल गए, परन्तु हम नहीं तिरे ॥
सोचते यही रहे, एक फिर लहर बहे।
इन्तजार में रहे न चेतना जगा सके ॥ 3 ॥

पुण्य बन्ध कुछ हुआ, मनुष्य का मिला भवन।
धन वैभव अधिक हुआ उसी में एक दम मगन ॥
चाटुकार राह दें उसी तरफ बढ़े चरण।
न सत्य की लगन रही न धर्मध्यान में है मन ।।
बात-बात पर अड़े, नैन भी चढ़े-चढ़े।
शान के मकान पर गुमान से हुए खड़े ॥
दैव था भी हंस रहा, मूर्ख आप फंस रहा।
चक्रवर्ती भी न भाग्य फल कभी हटा सके। 4 ।।

भाग्य साथ दे गया महाव्रती हुए कभी।
राग-द्वेष पुण्य-पाप आदि छोड़कर सभी ।
भूख प्यास शीत घाम आदि सह उठे सभी।
ख्याति हो गई कि साधु श्रेष्ठ हैं यही अभी॥
भक्त कुछ बड़े-बड़े, सिर झुका हुये खड़े।
डगमगा गये कदम न रह सके वहीं अड़े।
कौन काम आ सका, कीर्ति से बचा सका।
खो प्रकाश पास का न और ज्योति ला सके॥5॥