रे जिया! सील सदा दिढ़ राखि हिये
रे जिया! सील सदा दिढ़ राखि हिये ॥टेक॥
जाप जपत तप तपत विविध विधि, सील बिना धिक्कार जिये ॥
सील सहित दिन एक जीवनो, सेव करैं सुर अरघ दिये ।
कोटि पूर्व थिति सील विहीना, नारकी दैं दुख वज्र लिये ॥
रे जिया! सील सदा दिढ़ राखि हिये ॥१॥
ले व्रत भंग करत जे प्रानी, अभिमानी मदपान पिये ।
आपद पावै विघन बढ़ावैं, उर नहिं कछु लेखान किये ॥
रे जिया! सील सदा दिढ़ राखि हिये ॥२॥
सील समान न को हित जगमें, अहित न मैथुन सम गिनिये ।
‘द्यानत’ रतन जतनसों गहिये, भवदुख दारिद-गन दहिये ॥
रे जिया! सील सदा दिढ़ राखि हिये ॥३॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: nikkyjain.github.io (पं द्यानतराय कृत भजन)
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