लघु बोध कथाएं - ब्र. रवीन्द्र जी 'आत्मन्'


#1

लेखक - ब्र. रवींद्र जी ‘आत्मन्’

Contents:


#3

विवेक और उदारता

एक थी सत्संस्कारों में पली हुई बेटी। नाम था विनीता। नाम के ही अनुकूल बड़ों की विनय एवं सेवा को सौभाग्य मानती थी। प्रमाद-रहित स्वच्छ एवं चुस्त चर्या। अपने अध्ययन के साथ ही परोपकार में दत्तचित्त । सहज ही सर्व की प्रिय ।
दैवयोग से उसका विवाह धनी किन्तु कंजूस परिवार में हो गया। जहाँ न पात्रदान न करुणादान।
एक दिन एक अशक्त, भूखा और असहाय वृद्ध द्वार पर आया। बहू ने देखा और वासी सूखी रोटी दे दी।
वृद्ध ने कहा- “बेटी ! यह तो मुझसे नहीं खाई जायेगी।

बहू- “बाबा ! इस घर में वासी ही खाया जाता है।”

बहू की विनय, सेवा एवं कर्तव्यनिष्ठा से प्रसन्न रहने वाले वहीं खड़े हुए उसके श्वसुर बोले- '‘बेटी ! ऐसा क्यों कहती हो?’ |
बहू- ‘पिताजी ! इस घर में मैंने यही देखा है कि पूर्व पुण्य से प्राप्त सम्पदा को भोगो और जोड़ो। दान, पुण्य, धर्म आदि तो देखा ही नहीं।"

श्वसुर को अपनी भूल समझ में आयी। फिर तो बहू ने उस भूखे वृद्ध को अच्छा भोजन कराया और धर्ममार्ग में लगने की प्रेरणा की तथा उसका परिचय प्राप्त कर सच्चरित्र जान घर के समीप ही एक कोठरी रहने को दे दी।
वृद्ध भी कृतज्ञ-भाव से यथाशक्ति घर के कार्यों में सहयोग करने लगा। घर के छोटे बच्चों को तो वह बहुत प्यार से खिलाता। उनसे अच्छी बातें करता, बड़े बच्चों से तो वह अच्छी पुस्तकें पढ़वाता और प्रसन्न रहता। बहू की सद्बुद्धि से मिल गया परिवार को एक विश्वसनीय सेवक।

एक दिन बुखार आया और अल्प समय में वह भगवान का स्मरण करता हुआ और देह से भिन्न आत्मा का चिन्तन करता हुआ, सभी से क्षमाभाव-पूर्वक शान्त परिणामों से देह छोड़ कर, सद्गति को प्राप्त हुआ।

“जिसप्रकार नाप से छोटा जूता तो मात्र पैर में ही कष्ट देता है, परन्तु नाप से बड़ा जूता तो गिराकर पूरे शरीर को कष्ट देता है, उसी प्रकार धन की कमी से तो व्यक्ति मात्र परेशान ही होता है, परन्तु धन की अतिवृद्धि व्यक्ति को अहंकारी, विलासी, क्रूर आदि बनाकर पतन के गर्त में गिरा देती है।”


#4

सल्लेखना महोत्सव

आत्मार्थी विद्वान् प्रशान्त जैन अपने नाम के अनुरूप ही धीर, गम्भीर एवं शान्त स्वभावी थे। प्रौढ़ावस्था में ही व्यापारादि से निवृत्त हो परिवार से निरपेक्ष घर में रहते हुए भी गृहत्यागी की भाँति, प्रदर्शन और ख्याति की वांछा से दूर निरन्तर तत्त्वाभ्यास में लगे रहते थे।

प्रात: ब्रह्ममुहूर्त में उठकर आत्मचिन्तन एवं वैराग्यपाठ आदि करते। शौच-स्नानादि के पश्चात् शुद्ध वस्त्र पहनकर भगवान की पूजा, स्वाध्यायादि करते। वात्सल्यपूर्वक साधर्मीजनों को भोजन कराते । यह उनका दैनिक नियम ही था। कोई अतिथि न मिलने पर वे स्थानीय गोष्ठी के ही किसी साधर्मी को ही भोजन के लिये बुला लाते। अकेले भोजन करना उन्हें अच्छा ही नहीं लगता था। भोजन में भी सादगी और सहजता । न कोई प्रदर्शन, न विशेष औपचारिकता।

दीन-दु:खियों का भी यथायोग्य गुप्त रीति से सहयोग करना उनकी प्रवृत्ति ही बन गयी थी।

मूलगुणों के नियम के साथ ही वे अणुव्रतों का भी यथाशक्ति पालन करते थे। ब्रह्मचर्य तो उन्होंने युवावस्था में ही ले लिया था।

बाजारू खाद्य एवं विलासिता की सामग्री के लिए तो उनके घर में ही कोई स्थान नहीं था। उनकी धर्मपत्नी समता, बालक विनीत एवं पुत्रवधू सुनीता भी उनके अभिन्न सहयोगी थे।

पर्व के दिनों में एकाशनादि सहज ही होते । उनका कक्ष सबसे अलग एकान्त में था। जिसके समीप उनके आगन्तुक साधर्मी भी प्रायः रुके ही रहते थे।

भेदज्ञान ही उनका जीवन था और वैराग्य ही शृङ्गार। किसी प्रकार की सांसारिक लालसा भी उनके मन में न आती।

अब तो एक ही भावना थी, संयमपूर्वक समाधि हो। उसके लिए समस्त लोकव्यवहारों से भी निवृत्त हो आराधना में सावधान रहते।

एक दिन जिनमन्दिर से लौट कर भोजन करके बैठे थे। उन्हें शरीर में कुछ अशक्तता विशेष लगी। वैसे उनकी इन्द्रियाँ सजग थीं। फिर भी उन्होंने एक वसीयत लिखी।

जिसमें आवश्यक वस्त्रादि रखकर, समस्त परिग्रह का त्याग करते हुए अपना व्यक्तिगत धन एवं वह मन्दिरजी के समीप वाला स्वयं का आवासीय स्थान भी धार्मिक एवं लोकोपकारी कार्यों में समर्पित ईमानदार एवं कर्तव्यनिष्ठ साधर्मीजनों द्वारा संचालित ट्रस्ट को सौंपते हुए, यह निर्देश दिया कि मेरे द्वारा जिन कार्यों एवं संस्थाओं को जो सहायता दी जा रही है, वह निर्विघ्नरूप से चलती रहे। वे अपने परिजनों और सेवक आदि को तो पहले ही योग्य सम्पत्ति आदि दे चुके थे।

फिर बाहर से भी सभी साधर्मीजनों को निमन्त्रण देकर मन्दिर में सादगीपूर्वक विधान कराया और उसी समय साधर्मीजनों की उपस्थिति में ही सल्लेखना धारण कर ली।

अब वे प्रायः मौन रहते । स्वयं उपयोग को साधते रहते। कोई न कोई साधर्मी उनके समीप रहता। तत्त्वचर्चा के अतिरिक्त अब वहाँ दूसरी चर्चा निषिद्ध थी। पूजा, स्वाध्याय, सामायिक ध्यानादि भली प्रकार चल रहे थे। निर्यापक के रूप में तत्त्वाभ्यासी साधर्मी ‘जिनेन्द्रजी’ को समीप रखा था। भोजनादि सीमित होता जा रहा था। किसी प्रकार की विशेष पीड़ा न उनके शरीर में थी, न मन में। प्रसन्न, शान्त एवं गंभीर मुद्रा उनकी अन्तरंग निस्पृहता एवं पवित्रता को सहज ही प्रगट कर रही थी।

विशुद्धता के बल से, अपनी संयोगी पर्याय का अन्तकाल अतिनिकट भासित होते ही, उन्होंने सभी से पुनः क्षमायाचना की व क्षमाभाव धारण किया और निर्ग्रन्थ गुरु का उस समय सुयोग न मिलने के कारण, पंच परमेष्ठी भगवन्तों की साक्षीपूर्वक जिन प्रतिमा के सन्मुख समस्त परिग्रह का त्याग करके केशलौंच करते हुए निर्ग्रन्थ दीक्षा ग्रहण की। निर्दोष वृत्तिपूर्वक पहले से शुद्ध भोजन करने वाले साधर्मी श्रावक के यहाँ विधिपूर्वक थोड़ा जल लेकर उन्होंने आजीवन उपवास का नियम ले लिया।

प्रसन्नता बढ़ती जा रही थी। यह मंगल समाचार वायुवेग से देशभर में पहुँच रहा था। दूर-दूर से साधर्मीजन इस मंगलमयी। दृश्य को देखने आ रहे थे और तीसरे दिन मध्याह्न १ बजे वे देह से प्रस्थान कर स्वर्गवासी हुए।

साधर्मीजनों ने पूर्व से तैयारी कर ली थी। अतिशीघ्र निकट उद्यान में चन्दन, नारियलादि की चिता पर उनका भौतिक शरीर रखा गया और मंगलाचरणपूर्वक अग्नि में देह का विसर्जन हुआ। भौतिक शरीर तो विलीन हो गया, परन्तु संयम की सुगन्ध दिशाओं से आज भी आ रही है। यश:शरीर आज भी अमर है और भव्य जीवों को निरन्तर मोक्षमार्ग में प्रेरित कर रहा है।

पंचम काल की विषम परिस्थियों में, हीन संहननादि होने पर भी तत्त्वज्ञान और वैराग्य के बल से हम भी जीवन सफल करें यही भावना हम भी भाते हैं।


#5

बड़े का बड़प्पन

जलगांव निवासी दोनों भाई परिस्थितिवश बंटवारा करके अलग रहने लगे। बड़ा भाई समकित अपना व्यापारादि स्वयं देखता और नौकरों के कार्यों पर भी सूक्ष्मदृष्टि रखता; अतः उसकी सम्पत्ति बढ़ती गयी।
छोटे भाई शशांक ने प्रमादी हो सारा कारोबार नौकरों के भरोसे छोड़ दिया; अत: उसके व्यापार में घाटा होने लगा। बडे़ भाई ने बीच बीच में अनेक बार समझाया, पर भवितव्यतानुसार बुद्धि हो जाती है; अतः उसकी समझ में नहीं आया। अन्त में दुकान भी बिकने की नौबत आ गयी।
बड़े भाई ने जानकारी होने पर उसे बुलाया। प्रेम से धीरज बंधाया। उसका कलेजा चुकाया और उसे अपने साथ में काम करने के लिए तैयार किया।छोटा भाई भी प्रेम के वश हो, बड़े भाई के निर्देशन में काम करने लगा। धीरे-धीरे उसकी उन्नति होती गयी। बड़े भाई ने उसका हिस्सा पुनः उसे ही दे दिया।
स्वावलम्बन और उदारता का पाठ पढ़ाते हुए, स्वाध्याय की प्ररेणा की। स्वाध्याय से छोटे भाई की आंखें खुलीं। उसने पुण्य- पाप एवं धर्म का स्वरूप समझा और बड़े भाई का उपकार मानता हुआ, अपना जीवन सार्थक करने में लग गया।


#6

प्रायश्चित्त

एक दिन रानी के हार के लिए मथुरा नरेश को उत्तम मोतियों की जरूरत पड़ी। राजा ने नगर के जौहरी लोगों को बुलाकर कहा; परन्तु सबके द्वारा मना करने पर, देखा-देखी वृद्ध जौहरी रतनचन्द्र ने भी मना कर दिया। राजा को क्रोध आ गया और उसने कहा- जिसके यहां मोती पाये जायेंगे, उसका धन हरण कर, नगर से निकाल दिया जायेगा।
वृद्ध जौहरी रतनचन्द्र घर जाकर अत्यंत भयभीत हुआ। उसने स्वाध्याय कराने वाले अपने पंडितजी ज्ञानेन्द्रजी से समाधान पूछा।
पण्डितजी- “भूल छिपाना कठिन भी है और कष्टकर भी । भूल मिटाना सरल भी है और सुखकर भी। एक असत्य को छिपाने के लिए अनेक असत्य उपाय करना, कदापि उचित नहीं।”
उनकी नेक सलाह के अनुसार, वह एक उत्तम मोतियों का सुन्दर हार लेकर राजदरबार में पहुंचा और अपनी भूल की विनयपूर्वक क्षमा मांगते हुए वह हार स्वयं रानी को भेंट कर दिया।
बड़े पुरूष विनय से प्रसन्न हो जाते हैं। इस न्याय से राजा ने प्रसन्न हो उन्हें क्षमा कर दिया।
सदैव ध्यान रखें कि रोग का इलाज जितनी शीघ्र किया जाए उतना ही सुगम है। ऐसे ही भूल भी शीघ्र ही स्वीकार कर दूर कर ली जाये, इसी में हित है।


#7

संयम की दृढ़ता

पिता विरक्त हो साधु हो गये, पुत्र भी ब्रह्मचर्य व्रत ले संघ में रहने लगा। एक दिन गर्मी अधिक थी, विहार करते हुए पिता ने पुत्र की व्याकुलता को समझा और मोह वश कह दिया- हम लोग आगे मिलेंगे, तुम धीरे धीरे आ जाना। पुत्र नदी के समीप अकेला रह गया। उसका मन पानी पीने का हुआ, परन्तु तुरन्त उसने विचार किया- भले ही स्थूल रूप से कोई नहीं देख रहा, परन्तु सर्वज्ञ के ज्ञान से तो कुछ भी छिपना सम्भव नहीं है और शरीर के मोहवश मैं अपना संयम क्यों छोड़ूं? वह शांत चित्त हो बैठ कर तत्त्वविचार पूर्वक तृषा परिषह जीतता रहा, परन्तु आयु का उसी समय अन्त आने से उसकी देह छूट गयी और संयम की दृढ़ता एवं शान्त परिणामों से स्वर्ग में देव हुआ।
तत्काल अवधिज्ञान से समस्त प्रसंग समझकर, वह उसी पुत्र का वेश बनाकर संघ में आया। उसने अन्य साधुओं को नमस्कार किया, परन्तु पिता को नहीं। वह बोला- " साधु होकर आपको ऐसा मोह एवं छल करना उचित नहीं था। मैंने अपना नियम नहीं छोड़ा और देह छोड़कर स्वर्ग में देव हुआ। हे गुरुवर! आप भी प्रायश्चित्त करें।"
पिता ने भी प्रायश्चित्त किया और साधना में सचेत हो, तल्लीन हो गये।


#8

वात्सल्य

शैलेष ग्राम में रहने वाली अपनी बहिन सुलोचना के घर गया। उसे भूख लगी थी। उसने बहिन से कुछ खाने को मांगा।
सुलोचना हर्ष विभोर हुई, खेत से आई ताजी मटर छील-छील कर भाई को खिलाने लगी और खुद भी खाने लगी, परन्तु छिलके भाई को देती जाती और मटर स्वंय खाती जाती।
उसी समय उसका पति भी आ गया और देखकर बोला-“ये क्या कर रही हो?”
और स्वयं मटर छिल कर पत्नि के भाई को देने लगा।
खाते हुए भाई बोला-“मटर तो मीठी है ही, परन्तु छिलके और भी अधिक मीठे थे।”
पति विवेकी था तुरन्त बोला-"मीठा तो वात्सल्य होता है। तुम्हारा कहना ठीक ही है।"पश्चात् घर की कुशलक्षेम पूछने लगा। थोड़ी देर बाद अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक दोनों ने भोजन किया।
थोड़ी देर विश्राम के बाद भाई ने अपने घर की राह पकड़ी।


#9

स्याद्वाद से समाधान

एक बार दतिया के शक्तिशाली राजा विश्वलोचन ने अपने राज्य के समस्त धर्मगुरुओं को बुलाकर आदेश दिया-“आप लोग जब तक अलंग-अलग मान्यताएं छोड़कर सब एकमत नहीं हो जाते, तब तक कारागृह में रहेंगे।”
वे लोग कुछ भी उत्तर न दे पाने से कारागृह में बन्द कर दिये गये।
कुछ ही दिनों में वहां एक दिव्यांशु नामक विद्वान आया। राजा ने कुशलक्षेम पूछने के पश्चात् पूछा-“आपको हमारी नगरी कैसी लगी?”
विद्वान्- " नगरी तो सुन्दर है परन्तु बाजार में अनेक दुकानें ठीक नहीं हैं। सबको मिलाकर एक दुकान बना दी जाये। इसी प्रकार विद्यालयों में अनेक कक्षाओं की जगह एक हाल में सामूहिक पढ़ाया जाये। चिकित्सालय के भी अनेक विभाग समाप्त कर दिये जायें तो कितना सुन्दर और सरल हो जाते।"
राजा-" ये न तो सम्भव है और न व्यावहारिक।"
विद्वान्-" तब फिर सभी मनुष्यों के विचार समान कैसे हो सकते हैं? चारों गतियों से आने और चारों गतियों में जाने वाले जीवों के परिणाम एवं विचार एक-से कैसे होंगे और मुक्ति जाने वाले जीवों के परिणाम तो सबसे अलग ही होंगे। आपकी सबको एकमत कर देने की कल्पना कैसे सम्भव है ?"
राजा को अपनी भूल समझ में आ गयी और उसने सभी को कारागृह से मुक्त कर दिया।
माध्यस्थ- भावपूर्वक रहना ही हितकर है। जिज्ञासु जीवों को उपदेश देने से, जो वस्तुस्वरुप को समझते जायेंगे, वे सहज मोक्षमार्गी होते जायेंगे।


#10
कर्त्तव्यनिष्ठा

बरसाती नदी के ऊपर रेलवे का एक पुराना पुल था। उसके समीप ही एक बुढ़िया अपने इकलौते बेटे के साथ रहती थी। वह बेटे को धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा के संस्कार कहानियों के माध्यम से स्वयं देती थी ; अतः उसका ह्रदय परोपकार एवं सेवा की भावना से भरा हुआ था।
एक रात्रि घनघोर वर्षा के कारण वह पुल टूट गया , उसकी आवाज से समझकर , लड़के ने वर्षा में भीगते हुए जाकर स्वयं टूटा पुल देखा। उसी समय गाड़ी आने का समय हो रहा था। उसने शीध्र ही अपनी लाल कमीज को एक डण्डे में लगाया और एक बड़ी टॉर्च लेकर पुल से पहले ही लाइन के किनारे खड़े हो गया। दूर से ही ड्रायवर ने लाल रंग का इशारा देखकर गाड़ी रोकी , उतरकर पूछा - तब उसने ड्रायवर को टूटा पुल दिखाया।
ड्रायवर एवं यात्रियों ने उसे धन्यवाद एवं इनाम भी दिये।, परन्तु वह तो इतने लोगों की रक्षा हो जाने से ही खुश था।
ड्रायवर ने समीप के स्टेशन पर सूचना भेजी , शीघ्र पुलिस एवं विभाग के अधिकार और समीप के गाँव के लोग आ गये। सभी ने यात्रियों की व्यवस्था की।
उसमें एक अधिकारी ने प्रसन्न होकर उस लड़के को पढ़ाने एवं रेलवे में योग्यतानुसार सर्विस देने की घोषणा कर ही दी। माँ सहित उसे स्टेशन के समीप ही आवास दिया गया , जिससे वह आगे की पढ़ाई भी कर सके।
सूचना पाकर शिक्षा - विभाग ने भी उसे छात्रवृत्ति प्रदान की और वह आगे रेलवे - विभाग में ही उच्च अधिकारी बना।