लघु बोध कथाएं - ब्र. रवीन्द्र जी 'आत्मन्' | Laghu Bodh Kathayen

सफलता मन्त्र-तन्त्रों से नहीं

ग्यारहवीं कक्षा का छात्र शोभित खेल में भाग लेता। बड़ी लगन से अभ्यास करता और प्रथम स्थान प्राप्त करता था, परन्तु उसके चाचा ने एक ताबीज दे दिया था और तब से वह अपनी सफलता का कारण ताबीज को ही समझता था। उसके पिता का स्थानान्तरण हो गया और वह दूसरे स्थान पर विद्यालय में पढ़ने लगा।
एक बार वहाँ भी प्रतियोगिता में उसने भाग लिया, परन्तु उसके पास ताबीज न होने से वह अत्यन्त घबड़ाया। तब उसका मित्र जतिन उसे अपने पिताजी के पास ले गया। उसके पिताजी ने कहा -“तुम लगनपूर्वक अभ्यास करो। ताबीज की व्यवस्था हम कर देंगे।”
शोभित ने मेहनतपूर्वक अच्छा अभ्यास किया, परन्तु प्रतियोगिता के समय निराश हो रहा था। तभी दौड़ा हुआ आया और छोटा-सा पार्सल उसे दे दिया। वह अत्यन्त हर्षपूर्वक प्रतियोगिता में सम्मिलित हुआ और सफल हुआ।
जतिन के घर जाकर, जब वह धन्यवाद देने लगा तब मित्र के पिताजी ने पार्सल खोलने को कहा। देखने पर उसमें एक कंकड़ मिला। तब उन्होंने कहा -
"बच्चों इसप्रकार अन्धविश्वासों में नहीं पड़ना चाहिए। सफलता ताबीजादि से नहीं ; लगन, विनय और विशुद्धि से मिलती है। "

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संयुक्त परिवार

एक था बाईस वर्ष का युवक स्वराज। उसका संयुक्त परिवार था। अनुशासन, प्रेम,शील और संस्कृति की मर्यादाओं में सुरक्षित एवं प्रतिष्ठित। युवक के दो बड़े भाई व एक बहिन भी थी। सबका विवाह हो गया था। उनके बच्चे भी थे। एक वर्ष पूर्व स्वराज का भी विवाह एक पढ़ी-लिखी कन्या दामिनी से हो गया था।
उसे छोटा होने से व्यापार में अधिक समय देना पड़ता और दामिनी को गृहकार्य एवं वृद्ध माता-पिता की सेवा में; अतः मौज-मस्ती के लिए समय ही नहीं मिलता और आधुनिक जिन्स आदि पहनने, होटल ,सिनेमा या बाजार घूमने ,काम के समय टी.वी. आदि देखने पर प्रतिबन्ध था। वह मंदिर भी सास या जेठानी के साथ जाती। भोजन भी महिलाएँ अलग करतीं और पुरुष अलग, पहिले कर लेते।
सुविधानुसार स्वाध्याय आदि में भी पहुँचना आवश्यक था। घरेलू कार्यों से दूर, छात्रावास में पढ़ने वाली दामिनी इस वातावरण को अपनी स्वच्छन्दता के लिए बाधक समझती और भीतर-भीतर दुःखी रहती हुई, पति को न्यारे रहने के लिए दबाव डालती। पति भी धन और यौवन के मद में ऐसा ही विचार कर रहा था।
बुद्धि भी भवितव्य के अनुसार हो जाती है, सहायक भी मिल जाते है। इस नियम के अनुसार, उसने इस सम्बन्ध में स्वाध्याय गोष्ठी में प्रवचन करने वाले सदैव गम्भीर और प्रसन्न मुद्रायुक्त प्रौढ़ पंडितजी को एक पत्र लिखकर दिशा-निर्देश माँगा।
पत्र पढ़कर पंडितजी गम्भीर हो गये और उन्होंने पत्र द्वारा ही उसको सम्बोधन किया। संयुक्त परिवार में शील, संस्कृति एवं सम्पत्ति की सुरक्षा रहती है। विनय, सेवा ,वात्स्लय के संस्कार रहते है। लोक-व्यवहार में सुविधा रहती है। सन्तान के जन्म एवं पालन-पोषण में बड़े लोगों के अनुभवों का लाभ मिलता है। विपत्ति के समय में असहायपना नहीं लगता। समाज में प्रतिष्ठा रहती है। दुर्व्यसनों से बचे रहते है, इत्यादि अनेक लाभ है।
एकाकी परिवार में गृहस्थी के अनुभव न होने से कदम-कदम पर गलतियाँ होती है। सन्तान के जन्म एवं पालन-पोषण में अनेक कठिनाइयाँ आती है। बुद्धि स्वार्थी हो जाती है। बड़ो का अनुशासन न रहने से विनय ,वात्सलय ,उदारता आदि गुण नहीं रह पाते ,मात्र मोहवश संकीर्ण विचारों में घुटते रहते है। पुण्य के उदय में तो कुछ होश नहीं रहता ,परन्तु पाप के उदय में किं कर्त्तव्य हो भटकता फिरता है।
भौतिक सुख-सुविधाओं में रहने से अमर्यादित भोग ,खान-पान व वेशभूषाएँ अन्तर की दुर्वासनाओं को उत्तेजित करती रहती है। पति व्यापार में व्यस्त ,बच्चे स्कूल में और पत्नी अकेली घर में होने से ,शील-हरण और चोरी आदि घटनाएँ ,नौकरों व अन्य लोगों के द्वारा होती हुई सुनी-पढ़ी जाती है। रोगादि के समय परिवार वाले ही काम आते है।
अलग रहने पर कहीं भी जाना हो तब घर का ताला लगाकर जाना पड़ता है। बच्चों की समस्या भी बनी रहती है। उन्हें दादा-दादी ,ताऊ,चाचा आदि का दुलार भी नहीं मिल पाता इत्यादि अनेक हानियाँ है।
अनेक पत्रोत्तरों के माध्यम से इन बिन्दुओं पर जब विचार विमर्श हुआ तब अनेक तथ्य स्पष्ट हुए और पत्रोत्तरों को जब स्वराज के साथ-साथ उसकी पत्नी दामिनी एवं परिवारीजनों ने पढ़ा तब उनकी आँखे खुली और एक संयुक्त बैठक में एक-दूसरे की पीड़ाओं को समझते हुए सुधार भी किया और भविष्य की व्यवस्थित रुपरेखा बनाते हुए संयुक्त ही रहने का पक्का मन बना लिया।
परिवारीजनों ने उन पत्रों को पण्डितजी से व्यवस्थित और विस्तृत करवा कर उनका प्रकाशन भी कराया। जिससे कर्तृत्त्व के अहंकार ,स्वच्छन्द भोगवृत्ति एवं संकीर्ण विचारों से टूटते हुए परिवारों की भी रक्षा हो सके। भारतीय संस्कृति के ह्रास ,प्रेम-विवाह ,पति-पत्नी के सम्बन्ध-विच्छेद,अनेक प्रकार के दुराचरण,अराजकता, असुरक्षा, बच्चों के उत्पीड़न,वृद्धों की योग्य सेवा-समाधि न होने, रोगों की वृद्धि आदि अनेक समस्याओं का प्रमुख कारण एकाकी परिवार भी है।
निवृत्तिमार्ग में जो संघ का महत्त्व है, वही गृहस्थ जीवन में संयुक्त परिवार का समझना चाहिए और सदैव ध्यान रखना चाहिए कि संघ में शक्ति भी है और सुरक्षा भी।

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दृढ़ संकल्प

एक युवक था विकास। दिन में पचास-साठ सिगरेट पीता था। एक बार माँ के साथ आध्यात्मिक एवं नैतिक गोष्ठी में जाना पड़ा। वहाँ भली होनहार से प्रवचनों की ध्वनि कान में पड़ी और वह बाहर से समीप के कमरे में छिपकर सिगरेट भी पीता रहा, साथ ही प्रवचन भी सुनता रहा। सिगरेट कम पी पाता, प्रवचन का रस कुछ अधिक आने लगा। प्रवचनों में नैतिकता, नशा के दुष्परिणाम,जुआ की बर्बादी, कुसंगकी बुराइयाँ, विकृत साहित्य, टी.वी. सीरियल आदि जैसे विषय भी आये।
सुनते-सुनते उसे अंधकारमय भविष्य, संक्लेशमय कुमरण, पत्नी का वैधव्य, बच्चे का अनाथपना प्रत्यक्ष-सा दिखने लगा।
उसने एकान्त में खूब विचार किया और दृढ़ संकल्पपूर्वक सिगरेट का त्याग कर दिया।
घर आया। शरीर में चक्कर, सिरदर्द के कारण नींद न आने से परेशान हुआ। आँखे सूज गयी, परन्तु साहस न छोड़ा। पत्नी ने धैर्य बँधाया, घरेलू उपचार किये। चिकित्स्क का भी सहारा लिया, परन्तु उसने विपरीत विचार नहीं किया।
विकृतियाँ स्वभाव तो हैं नहीं। प्रभुभक्ति और संयम के बल से धीरे-धीरे सामान्य हो गया। परेशानियाँ भी मिट गयीं और नशा भी छूट गया।
इसीप्रकार दिन में १०० गुटखा तक खाने वाले युवक ने, गुटखा का त्याग करके अपना जीवन बचाया।
विवेक, संकल्प-शक्ति, धैर्य, प्रभु भक्ति, सद्विचार, उचित उपचार व सहयोग आदि से बुराइयाँ छूटना सहज सम्भव है। उनका छूटना असम्भव मानकर निराश कदापि न होवें।

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छोटा पाप -बड़ा फल

नगर के समीप ही एक मन्दिर एवं साधकों के लिए आश्रम बना हुआ था। एक निस्पृही ,शान्तचित्त व त्यागी साधक के सानिध्य में अनेक व्यक्ति धर्म-साधना कर रहे थे। आदर से लोग उन्हें गुरुदेव, महात्माजी आदि नामों से पुकारते थे।
नगर में बाहर के कुछ चोरों ने चोरियाँ प्रारम्भ कर दीं। जनता परेशान हो रही थी। एक दिन तो उन चोरों ने राजकीय खजाने में चोरी की,परन्तु रक्षकों ने देख लिया। चोर भागे और चोरी का मॉल आश्रम में फेंककर, वहीं -कहीं छिप गये। रक्षकों ने गुरुदेव को पकड़ लिया। न्यायाधीश ने नगर को बढ़ती हुई चोरियों और खजाने की चोरी के कारण जनता को उत्तेजित देखते हुए,शीघ्रता में साधु की सजा सुना दी।
जल्लाद उन्हें शूली के स्थान पर ले गये। गुरुदेव ने तो मौन ले लिया और उपसर्ग दूर होने पर ध्यानस्थ हो गये, परन्तु जल्लाद द्वारा बार-बार प्रयत्न करने पर भी शूली अपना कार्य नहीं कर रही थी। खड़ी हुई भीड़ भी आश्चर्य से देख रही थी। न्यायाधीश को समाचार मिला, उन्हें लगा कि गुरुदेव निरपराधी है। भूल मेरी हुई है। उन्होंने पहुँच कर क्षमा माँगी।
चोरों को ये जानकर अत्यन्त पश्चत्ताप हुआ। उनका भी ह्रदय बदल गया। उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया और भविष्य में चोरी न करने की प्रतिज्ञा कर ली। चोरी का माल लाकर रख दिया, जो जनता को वापस मिल गया।व्यक्ति ने प्रश्न किया- “गुरुदेव के निरपराधी होने पर भी इनको कष्ट क्यों हुआ ?”
वहीं खड़े एक निमित्तज्ञानी ने समाधान किया -“गुरुदेव ने पाँच वर्ष की आयु में एक तितली को काँटे से पकड़ा था। बाद में माँ के समझाने पर उसे छोड़ भी दिया और प्रायश्चित स्वरुप उस दिन भोजन भी नहीं किया था.उसी का परिणाम यह उपसर्ग था।”
सभी ने पूछा-“अज्ञान में हो जाने वाले छोटे से अपराध की इतनी बड़ी सजा ?”
गुरुदेव बोले_" पाप तो पाप ही है। पशु, पक्षियों, असमर्थों और सरल लोगों को कष्ट देने से तो विशेष पापबन्ध होता है।
जैसे अज्ञानवश अग्नि में हाथ डालने से भी जलते ही हैं, जहर खाने से मरते ही हैं; अतः सर्वप्रथम जीवों को अध्यात्म और अहिंसादिरुप सच्चे धर्म की शिक्षा देना चाहिए।"

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मधुर वचन

यशोवर्द्धन एक निर्धन,बेरोजगार,परन्तु सरल स्वभावी युवक था। वह नौकरी के लिए राजा के यहाँ गया। यद्यपि राजा को आवश्यकता नहीं थी, फिर भी उसकी सरलता और बातचीत के ढंग से प्रभावित होकर उसे रख लिया और स्वयं को पानी पिलाने का कार्य सौंपा। वह भी अत्यन्त निष्ठापूर्वक अपना कार्य करने लगा। एक बार राजा बाहर भ्रमण के लिए गया। रास्ते में पानी समाप्त हो गया। वह पानी के लिए शीघ्रता से आगे चलता हुआ एक गाँव में पहुँचा। लोगों ने बताया यहाँ एक मीठे पानी की बावड़ी है, परन्तु वहाँ एक राक्षस रहता है और वहाँ से कोई जीवित नहीं लौटता। इष्ट का स्मरण करता हुआ युवक मृत्यु की परवाह न करता हुआ वहाँ पहुँचा। उसने स्वयं पानी पिया और कलश में पानी लेकर चलने लगा। तभी वह राक्षस हाथ में एक टेड़ी,लम्बी,लटकती हुई लकड़ी दिखाकर बोला- “पहले यह बताओ कि मेरे हाथ में यह शस्त्र कैसा लग रहा है ?”
यशोवर्द्धन- “राक्षस देव !अत्यन्त सुन्दर। इसे मैं इन्द्र का वज्र कहूँ या भीम की गदा, इसके लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं।”
राक्षस प्रसन्न होता हुआ- “तुम्हारे मिष्ट वचनों से मैं अत्यन्त प्रभावित हूँ। तुम पानी तो ले ही जाओ,एक वरदान भी माँग लो।”
युवक ने कहा- “गाँव में पानी के लिए लोग परेशान होते हैं। आप किसी को पानी के लिए रोंके नहीं,ऐसा मेरा विनम्र निवेदन है।”
राक्षस-" क्या कहूँ ?यह प्रश्न मैं सबसे करता हूँ परन्तु उनके कटु उत्तर से मेरा चित्त खिन्न हो जाता है। अब मैं किसी को नहीं रोकूँगा। तुम्हें कभी कोई आपत्ति आये तो स्मरण करना।"
यशोवर्द्धन ने गाँव में आकर सबसे कहा_ “अब पानी सबको मिलेगा,परन्तु कठोर अपशब्दों को बोलने का सभी त्याग करें।”
गाँव वाले प्रसन्न हुए। वे उससे भोजन का आग्रह करने लगे,परन्तु कर्त्तव्यनिष्ठ उस युवक ने शीघ्रता से जाकर सर्व प्रथम राजा को जल पिलाया।
राजा ने समस्त घटना को सुन कर उसकी अत्यन्त प्रशंसा की और उसे अपना अन्तरंग सलाहकार बना लिया।

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महामहिम शुद्धात्मा

गुरुकुल में अपनी शिक्षा पूर्ण करके घर आये हुए पुत्र की योग्यता को देखकर पिताजी अत्यन्त प्रसन्न हुए, परन्तु अभिमान को देखकर दुःखी।
उन्होंने पुत्र से कहा- “बेटा !उसका नाम बताओ,जिसके जानने पर अन्य कुछ जानने की आवश्यकता नहीं रहती और जिसके ज्ञान से ही सर्व का ज्ञान हो जाता है।”
पुत्र- “पिताजी !ऐसी तो कोई वस्तु नहीं है।”
पिता- “बेटा !वह निज शुद्धात्मा है,जिसके जानने पर ऐसी तृप्ति होती है कि अन्य वस्तु को जानने की अभिलाषा ही नहीं रहती। निजात्मा की आराधना के फल से ही जीव स्वयं वीतराग,सर्वज्ञ और अनन्त सुखी परमात्मा बन जाता है।”
पुत्र को अपने आत्मज्ञान से रहित ज्ञान की असारता भासित हुई। उसका अभिमान गल गया और वह लग गया अध्यात्म के अभ्यास में,आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए।

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देश भक्ति

कॉलेज के समीप एक विधवा स्त्री रहती थी। उसके पति तथा पुत्र शत्रुओं के आक्रमण करने पर देश की रक्षा करते हुए शहीद हो गये थे। देशभक्ति उसके हृदय में भी कूट-कूट कर भरी हुई थी।
घर बड़ा था। उसने घर पर गायें पाल रखी थीं। दूध बेचकर,संतोष-पूर्वक वह अपनी आजीविका चला रही थी। घर के कमरे में कुछ छात्र बाहर से आकर किराये पर रह लेते थे। उनका भोजन भी वह स्वयं एवं अपने ही पड़ोस के सद्गृहस्थ के सहयोग से बना देती थी।
एक बार एक छात्र ने उससे कहा- “माँ !आपको आर्थिक परेशानी रहती है, उसका एक सरल उपाय है कि आप दस लीटर दूध में एक लीटर पानी मिला दिया करें।”
वह स्त्री उसे धिक्कारते हुए बोली- “मेरा कमरा खाली करके अभी चले जाओ। मुझे ऐसा धन नहीं चाहिए। मैं अपने नगरवासियों के साथ विश्वासघात नहीं कर सकती। ऐसी खोटी सलाह देने का तुम्हें साहस कैसे हुआ ? दया दिखाने के नाम पर तुम मुझे बेईमानी सिखाते हो। तुम ऐसी शिक्षा ग्रहण कर रहे हो ! धिक्कार है तुम्हारी बुद्धि को।”
छात्र ने पैर पकड़ते हुए क्षमा माँगी और भविष्य में कहीं और कभी बेईमानी न करने की प्रतिज्ञा की। तभी उस महिला ने उसे वहाँ रहने दिया।
घर आने पर पिताजी एवं अन्य लोगों को यह घटना अत्यन्त गौरव से बताई और एक प्रेरक प्रसंग लिख कर उसे प्रकाशित एवं प्रसारित भी कराया।

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आदर्श माँ

एक स्त्री के एक लड़का था। पति का देहावसान हो चुका था। लड़के को शिक्षा के साथ ईमानदारी,सेवा व विनय,परोपकार आदि के संस्कार देने का प्रयत्न किया। लड़के ने भी लगनपूर्वक शिक्षा पूर्ण की और नौकरी खोजने लगा।
एक मित्र के पिताजी ने सहयोग किया। नौकरी तो मिल गयी,परन्तु बड़ी रिश्वत देनी पड़ी। लड़का उलझन में पड़ गया। उसने माँ को कुछ न बताया और नौकरी करने लगा और समझौता करते हुए उस रकम को चुकाने के लिए स्वयं भी रिश्वत लेने लगा।
धीरे-धीरे वह बड़ा अधिकारी बन गया। रकम तो चुक गयी,परन्तु उसकी रिश्वत की आदत ही बन गयी। विवाह हो गया हो गया। अपनी पत्नी,बच्चों के साथ बाहर ही रहना होता था। भय के कारण माँ के पास आना भी कम ही होता था।
माँ को किसी प्रसंगवश उसकी रिश्वत लेने की आदत मालूम हो ही गयी। उसने समझाने का प्रयत्न भी किया। उसके द्वारा भेजी जाने वाली सहयोग राशि भी लेने से इन्कार कर दिया।
पुत्र अन्तरंग में कभी-कभी दुःखी भी होता,परन्तु रिश्वत के त्याग का साहस नहीं कर पता था।
वृद्धा माँ बीमार हुई। पड़ोस के लोग उसे अस्पताल ले गये। पुत्र को खबर दी गयी। वह भी आ गया। डॉक्टर ने खून के लिए कहा। पुत्र आगे आया, परन्तु वृद्धा ने पूरी शक्ति से कह दिया-“डॉक्टर मुझे मर जाने दो, मुझे भ्रष्ट अधिकारी का खून नहीं चाहिए। अब मुझे चिकित्सा की भी आवश्यकता नहीं है। घर ले चलो। साधर्मीजनों के सानिध्य में सल्लेखना करुँगी।”
पुत्र का हृदय बदल गया। आँखो से आँसू बह रहे थे। माँ के चरण पकड़ते हुए रिश्वत न लेने की प्रतिज्ञा की। माँ को घर लाया। छुट्टियाँ लेकर माँ की सेवा की। साधर्मीजनों ने सम्बोधा और अत्यन्त उल्लासपूर्वक देह से भिन्न आत्मा का ध्यान करती हुई वह माँ, देह को छोड़ स्वर्गवासी हुई।
लड़के ने माँ की स्मृति में एक ट्रस्ट बनाया और उसके द्वारा वह आगे बढ़ता ही रहा। असमर्थों का सहयोग तो उस ट्रस्ट का प्रमुख कार्य था। उसे अपने बचपन के दिन एवं माँ का चेहरा सदैव याद रहता था।

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परिवर्तन

सेठ रामस्वरुप के पुत्र मनोहर ने एम.बी.ए. तक शिक्षा ग्रहण की। शिक्षा पूर्ण हो ही पाई थी कि पिताजी का देहावसान हो गया। परिवार का भार सिर पर आ गया। पिताजी का जमा-जमाया हुआ व्यापार ही आगे बढ़ाने का निश्चय किया। समझा और जुट गया। व्यापार तो काफी फैल गया, परन्तु व्यस्तता बहुत हो गयी। शान्ति से भोजन करने तथा माता, पत्नी व बच्चों के लिए समय भी नहीं निकल पाता था।
एक दिन माँ ने कहा - “बेटा ! दस-पन्द्रह मिनट के लिए तो मेरे पास बैठ जाया करो।”
बेटा - “माँ !आपको तकलीफ ही क्या है ? दान, पुण्य के लिए कोई रोक नहीं है, धर्म-ध्यान करो। पड़ोस में बैठ आया करो। मंदिरजी में समय लगाओ। मुझसे समय की अपेक्षा मत रखो।”
ऐसा कहते हुए वह ऑफिस निकल गया।
माँ की आँखों से आँसू निकल पड़े, परन्तु धन की दौड़ में अन्धे होकर दौड़ने वाले उस युवक को वे आँसू कहाँ दिखे ?
एक दिन पत्नी ने कहा -“आज छुट्टी है, मुझे शहर के मंदिरों के दर्शन करा लाओ। कुछ बाजार से सामान भी लाना है।”
युवक - “गाड़ी ले जाओ। रुपये ले जाओ। मुझे समय नहीं है, एक मीटिंग में जाना है।”
पत्नी - “शादी क्या धन से हुई है। तुम्हें कभी समय भी है ? ऐसे धन का क्या करोगे ?”
एक दिन बच्चे बोले - “पिताजी आपका फोटो अख़बार और टी.वी. में दिखता रहता है, परन्तु आपके तो दर्शन भी दुर्लभ है। आज तो आप हमें प्रदर्शनी दिखा दीजिये।”
युवक - " ( हँसकर ) माँ और मित्रों के साथ चले जाओ। मुझे जाना है।"
पड़ोस में पड़ोसी के दादाजी का देहावसान हो गया, परन्तु उसे समय कहाँ जो संवेदना व्यक्त करने जाता ?
तृष्णावश वह शुष्क-सा होता गया। प्रेम, वात्सल्य और व्यवहार-शून्य जीवन कब तक चले। धीरे-धीरे टेंशन रहने लगा। नींद न आने से पर्याप्त विश्राम न मिलने और शान्तिपूर्वक सात्विक भोजन न हो पाने से एसीडिटी आदि रहने लगे। ब्लडप्रेशर आदि हो गये। डॉक्टरों ने भी व्यापार सीमित करने और दिनचर्या व्यवस्थित करने की सलाह दी।
भली होनहार से एक दिन माँ व पत्नी-बच्चों सहित तीर्थयात्रा के लिए गया हुआ था। वहाँ वंदना से लौटकर आते समय प्रवचन सुनने का सुयोग बन गया। गृहस्थ जीवन में भी शान्ति के लिए -
- परिग्रह का परिमाण कर ही लेना चाहिए।
- ज्ञानाभ्यास के बिना, कषायें घटना भी सम्भव नहीं है।
- सुख आत्मा में है , निवृत्ति है। भोगों से तो तृष्णा ही बढ़ती है।
- एक दिन समस्त चेतन-अचेतन परिग्रह छूटना निश्चित है। समय रहते चेत जाना चाहिए।
- अनन्त दर्शन-ज्ञान-सुख-बल और प्रभुता से सम्पन्न भगवन्तों का जीवन ही आदर्श है।
- परद्रव्यों का स्वामित्व, कर्त्तव्य आदि मिथ्या है
- मिथ्यात्व और कषायों के मिटे बिना दुःख नहीं मिटता इत्यादि अमृत वचनों को सुनते हुए उनका रहस्य तो समझ में विशेष नहीं आया, शान्ति अवश्य मिली।
वंदना से शारीरिक थकान और प्रवचनों से मन को विश्रान्ति मिलने से खूब नींद आयी। प्रातः शीघ्र उठकर प्रवचन सुनने का उल्लास था। स्नानादि से निवृत्त हो वन्दना कर प्रवचन सुने। तीन दिन के कार्यक्रम में ही विचारधारा बदलने लगी।
माँ, पत्नी, बच्चों से क्षमा माँगते हुए, देवदर्शन, स्वाध्याय एवं व्यापार सीमित करने का नियम बनाया।
घर आये, एक समाधान और शान्ति लेकर। अब घर का वातावरण ही बदल गया था।
शीघ्र उठना, दर्शन-पूजन-स्वाध्याय, समय पर भोजन, परिवार के साथ-साथ भी भक्ति, पाठ, स्वाध्याय के साथ ही आत्मनिरीक्षण सहित सामायिक का अभ्यास।
सम्पदा को असार समझते हुए उसे पात्रदान एवं परोपकार में लगाने की योजना भी बनायी। निवृत्तिपूर्वक समाधि का लक्ष्य निर्धारित कर लिया।
रोग, टेंशन आदि स्वयमेव दूर हो गये। सत्य ही कहा है -
जिनरुप ही देखने योग्य है।
जिनवचन ही सुनने योग्य है।
जिनभावना ही भाने योग्य है।

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कृतज्ञता

दो भाई जिनेश और दिनेश अपना-अपना व्यापार करते हुए, एक ही घर में ऊपर रहते थे। भोजन अलग-अलग बनता। माता-पिता कभी ऊपर कभी नीचे सहजता से भोजन कर लेते थे। पिता का देहावसान हो गया। माँ अकेली रह गयी। छोटे भाई के बच्चे छोटे थे अतः माँ प्रायः छोटे भाई के पास नीचे ही रहती थी। दोनों भाइयों ने कहा कि माँ को कुछ राशि देना चाहिए। व्यवहार में लेन-देन के लिए, दो-दो हजार मासिक दोनों भाई देते रहेंगे और वे ऐसा ही करने लगे।
एक रात्रि में लेटे-लेटे बड़े भाई जिनेश को विचार आया कि जिस माँ ने हमें बिना हिसाब रखा, हमारा पालन-पोषण किया, मनमाना खर्च दिया,उस माँ को हम उसकी वृद्धावस्था में मात्र दो-दो हजार निश्चित वेतन की तरह दें, यह ठीक नहीं, कृतज्ञता नहीं है।
उसी समय उठा और अलमारी से नोटों की गड्डियाँ थैले में बिना गिने लेकर माँ के पास नीचे कमरे में पहुँचा। चरणों में सिर और थैला रखकर बोला- "माँ ! भूल क्षमा करें। अलमारी की चाबी ऊपर ही रखी रहती है। मुझसे पूछने की जरुरत नहीं है, आप स्वयं निकाल लेना।
आपके उपकारों का बदला चुकाने में तो मैं सब प्रकार असमर्थ ही हूँ। जब कमाने में सीमा नहीं, तब तुम्हें देने की सीमा क्यों रखूँ ? फिर कभी माँ की पेटी खाली नहीं रह पायी। वह देखता और बिना कहे ही और रख देता।
माँ भी सहजता और संतोष से धर्मध्यान में लगी हुई, अपनी आयु पूर्ण कर स्वर्गवासी हुई।
गुरुजनों को मात्र सामग्री एवं साधन दे देना ही पर्याप्त नहीं है; उन्हें आदर, सेवा और समय भी देना भी जरुरी है।
छोटे से उपकार के प्रति भी जिसमें अहोभाव नहीं आता, कृतज्ञता नहीं वर्तती, वह हृदय नहीं, पत्थर ही समझना।
सद्गृहस्थ के लिए (लौकिक दृष्टि से ) पिताजी घर का मस्तक है और माँ हृदय।

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संस्कारहीन शिक्षा

एक संस्कारित परिवार की अबोध कन्या थी। घर में धार्मिक संस्कार मिलने से उससे पिताजी कभी पूछते-“तुम्हें कैसा बनना है ?” वह सहजता से कह देती- “सीता माता जैसी।”
कुछ बड़ी होने पर शहर के कॉलेज में पढ़ने गयी। आधुनिक परिवेश, शील की हँसी उड़ाने वाले स्वच्छन्द साथियों का वातावरण। मन विकृत करने वाले अखबार, पत्रिकायें, टी.वी. के अश्लील सीरियल आदि। पापों को छिपाने वाले समस्त कुसाधनों की जानकारी भी सहज ही हो गयी।
जिस-तिस प्रकार शिक्षा पूर्ण कर किसी विदेशी कम्पनी में नौकरी करने लगी और वहीं किसी सहकर्मी के प्रेम में फँस कर जीवन बर्बाद हो गया। कुछ दिनों बाद एड्स की बीमारी हो गयी। नौकरी छूट गयी।
घर लौट आयी। लज्जा के कारण बाहर मुख भी नहीं दिखा पाती और तड़प-तड़प कर मर गयी।
सत्य है, सुसंस्कारों के बिना शिक्षा भी क्लेश का ही कारण है।

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दुर्व्यसन

सोमेश को कुसंग के कारण नशे की आदत पड़ गयी। तम्बाकू, गुटखा खाये बिना चैन नहीं पड़ता था। पढ़ा-लिखा भी कम था। मध्यम परिवार का वह युवक सामान्य सी आजीविका करता था। शादी हो गयी और एक बच्चा भी था। सामान्य रुप से ठीक चल रहा था। परन्तु तम्बाकू के सेवन से धीरे-धीरे सोमेश के मुख में कैंसर हो गया।
आजीविका बिगड़ गयी। माता-पिता पहले ही शान्त हो गए थे। कैंसर अस्पताल में भर्ती सोमेश की पत्नी को डॉक्टरों ने कह दिया कि जीवित रहना सम्भव नहीं है।
सोमेश बच्चे पर प्यार से हाथ फेरते कह रहा है- “बेटा !मैं भगवान के पास जा रहा हूँ। तुम मम्मी के साथ में आराम से रहना।”
बच्चा अपनी माँ से कहता है - “मम्मी ! पापा को हम भगवान के पास नहीं जाने दे तो !”
स्त्री प्यार से उसे गोद में ले लेती है, परन्तु अन्तव्यर्था किससे कहे ?
एक दिन पत्नी और बालक को विलखता हुआ छोड़कर सोमेश चला ही गया।
बचपन के सुसंस्कारों के बल पर स्त्री ने धैर्य धारण किया। अपने एक भाई को अपने पास बुला लिया। आजीविका की व्यवस्था कर, बच्चे को संस्कारित एवं शिक्षित करने में जुट गयी। बच्चे की आँखो के सामने, पिता के वियोग का वह दृश्य, कभी-कभी आ ही जाता था। बड़े होकर उसने अपने साथियों की एक समिति बनाई और नशा, जुआ, कुशील आदि दुर्व्यसनों के विरुद्ध अभियान प्रारम्भ कर ही दिया। सज्जनों का सहयोग मिला और अभियान प्रगति की ओर बढ़ता ही गया।
क्या हम भी इसप्रकार के अभियानों को संचालित कर सकेंगे, सहयोगी बन सकेंगे ? इसप्रकार के उत्पादनों एवं व्यापारों के त्याग की शपथ ले सकेंगे ?

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सच्ची दया

महानगर के फुटपाथ के किनारे बैठी एक भिखारिन की गोद में बैठे बच्चे की हाथ-पैर की अंगुलियाँ जली हुई थी। राहगीर दया से द्रवित होकर उसे कुछ न कुछ दे ही देते थे।
एक राहगीर ने पूछा- “बच्चे की अंगुलियाँ कैसे जल गयीं ?”
उसकी सज्जनता से प्रभावित होकर भिखारिन बोली- “स्वयं थोड़ी-थोड़ी जला दी हैं। पहले मुझे भीख मिलने में परेशानी होती थी। अब भीख आसानी से मिल जाती है।”
धिक्कार है ! ऐसी कुबुद्धि को, क्रूरता को और ऐसी मिथ्या-दया के प्रदर्शन को, जिसके कारण कितने ही बालकों का अपहरण होता है, उन्हें अमानवीय अत्याचारों का शिकार होना पड़ता है, किसी के पैर तोड़े जाते है, किसी को अंधा किया जाता है और दयनीय तरीके सिखाए जाते हैं, फिर उनसे भीख मँगवाई जाती हे, जिसमें से उन्हें मात्र भोजन आदि ही मिलता है। उसका लाभ स्वार्थी अराजक लोग उठाते हैं। काश ! उन्हें पता होता कि दुष्कृत्यों का फल जीव स्वयं ही भोगता है।
वह राहगीर सम्पन्न, विवेकी और दयालुवृत्ति का था। उसने उस स्त्री से कहा कि वह भिक्षावृत्ति के निकृष्ट धंधे को छोड़कर उसके साथ चले। वह उसे अपनी फैक्टरी में आजीविका दिला देगा और बच्चेको शिक्षित करेगा।
भिखारिन की भली होनहार थी। उसने उसकी बात मान ली और उसके साथ चली गयी। उसने अपनी फैक्टरी में उसे नौकरी दे दी और रहने को कोठरी। बच्चे को बड़ा होने पर स्कूल भेज दिया।
वह भिखारिन से मजदूरिन हो गयी। प्रसन्न रहने लगी। समय जाते क्या देर लगती है ? लड़का पढ़ाई भी करता रहा और अतिरिक्त समय में फैक्टरी में काम भी कर लेता। धीरे-धीरे वह फैक्टरी का ही मैनेजर बन गया। सेठजी के उपकार को सदैव याद रखता और सेठजी के सहयोग से उसने एक आश्रम बनाया, जहाँ असहायों को आजीविका एवं उन्नति के अवसर दिए जाते।

शील रक्षा

विद्या अपनी शिक्षा पूरी कर नगर के माध्यमिक विद्यालय में अध्यापिका बन गयी। सादगीपूर्ण रहन-सहन था। अपने कार्य को ईमानदारी से करने का प्रयत्न करती। बच्चों को विषय की शिक्षा के साथ ही समय-समय पर नैतिक शिक्षा भी देती रहती थी। गाँव वाले भी बच्चों में स्वच्छता, विनय, सेवा, परोपकार के संस्कारों को देखकर प्रसन्न होते और पीठ पीछे कहते - “हम लोगों के भाग्य से विद्या जैसी अध्यापिका गाँव में आ गयी है।”
एक दिन बस में जाते हुए हरे-भरे खेतों की ओर खिड़की से देखती हुई आ रही थी। कुछ दूर पर देखा कि एक लड़की को कुछ लड़के खेत की ओर पकड़ कर ले जा रहे हैं। उसने तुरंत ड्रायवर से कह कर बस रुकवायी। उतर कर देखा-लड़की के मुख पर कपड़ा ठूँस दिया है। लड़के देखते ही भागे, परन्तु उसकी ललकार से यात्रियों ने भाग कर उन्हें पकड़ ही लिया। यात्री मारने लगे, परन्तु उसने उन लड़को को भी बचाया।
लड़की को तो सांत्वना देकर अपने पास बैठा ही लिया। समीप के गाँव के लोग भी आ गये। उसने उन लड़कों को अच्छी तरह समझाया- “इस पाप के विचार मात्र से रावण की क्या दशा हुई ? तुम लोग स्वयं विचार करो।”
लड़के भी शर्मिन्दा होकर क्षमा माँगने लगे। उन्होंने अध्यापिका दीदी एवं उस लड़की के पैर छूकर शील की प्रतिज्ञा की कि हम जीवन-पर्यन्त सभी महिलाओं का योग्य सम्मान एवं सुरक्षा में सहयोग करेंगे। उनके साथ अपनी माता, बहिन एवं पुत्री जैसा ही सद् व्यवहार करेंगे।
कुछ लोग आक्रोश में उन्हें थाने ले जाकर सजा दिलाने के लिए उद्धत थे, परन्तु विद्या ने कहा - "भूल सुधारने के लिए क्षमा करते हुए अवसर प्रदान करना ही श्रेयस्कर है।"
बस तो चली गयी थी। गाँव के मुखिया और वे लड़के स्वयं उन्हें अपनी गाड़ी से उनके गन्तव्य पर छोड़ने गए और उससे गाँव में अपने ही सानिध्य में नैतिक शिक्षा शिविर लगाने की प्रार्थना की। जिसे दीदी ने सहर्ष स्वीकार कर ली।
दूसरे दिन अख़बारों में छपा - 'आज भी ऐसे लोग हैं।'

संयम की सुगन्ध

२५ वर्षीया रागिनी की शादी को अभी लगभग एक वर्ष ही हुआ था। अचानक उसके पति की मृत्यु हो गई और वह विधवा हो गयी। उसके सास-ससुर भी दूसरे विवाह के लिए आग्रह करने लगे, परन्तु रागिनी ने अत्यन्त विनय और दृढ़ता से कहा- “स्त्री का जीवन में एक ही पति होता है। मेरा ह्रदय किसी अन्य को पति के रुप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता। अब तो मैं आप लोगों के संरक्षण में संयमी जीवन बिताना चाहती हूँ। आप भी मुझे पुत्री समझें। बुढ़ापे में मैं आपकी सेवा करुँगी और समाधि भी कराऊँगी।”
सास ने दूसरे पुत्रो और बहुओं के मोह में मना किया, परन्तु ससुरजी ने स्वीकार कर लिया। वह प्रातः शीघ्र उठती। इष्ट-स्मरण कर दैनिक-चर्या, घर की सफाई आदि, पशुओं की सेवा और व्यवस्था करके मंदिरजी पहुँच जाती। वह दर्शन, भक्ति, स्वाध्याय और मंदिरजी की वैयावृत्ति आदि करते हुए प्रसन्न रहती। भोजन और घरेलू कार्यों में सहयोग कर, पुनः स्वाध्याय भवन पहुँच जाती। रात्रि को धार्मिक पाठशाला, मंदिरजी में स्वाध्याय में जाती।
दिन बीत रहे थे। घर में अन्य सदस्यों को धार्मिक रुचि न होने से वे लोग रात्रि को भी देर तक टी.वी. तेज स्वर में चलाते। घर छोटा था। उसे अच्छा न लगता, परन्तु सहन करती; फिर भी ताने मिलते। घर के कामों से इसे क्या ? ये तो दिन-भर मन्दिर में ही बनी रहती है।
सासूजी भी अन्य बहुओं की तरह बोलती। मन कभी दुःखी हो जाता। एक दिन मन्दिर में कुछ उदास बैठी थी। स्वाध्याय गोष्ठी की एक वृद्धा माताजी ने स्नेह से कारण पूछा तो उसे रोना आ गया। उसकी अन्तर्व्यथा को सुनकर, उन माताजी ने अपने पति से कहा- “एक महिलाश्रम बनवाना है, जहाँ संयम की भावना वाली कन्याएँ, विधवाएँ और वृद्धाएँ सभी धर्मध्यान कर सकें।”
पति भी सम्पन्न, उदार, वात्सलयभावी प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। उन्होंने कुछ साधर्मी भाइयों को बुला कर विचार-विमर्श किया और एक ट्रस्ट बनाया। मन्दिरजी के समीप वाली अपनी ही जमीन पर एक महिलाश्रम एवं एक विद्यालय व एक औषधलय आदि बनाने का निर्णय ले लिया।
समाज की एक मीटिंग बुलाई और सबकी सहमति से एक भव्य आयोजन कर, उसका शिलान्यास कर, पहले एक छोटा भवन बनाकर आश्रम प्रारम्भ कर दिया। उन्हीं संस्थापिका माताजी के संरक्षण में रागिनी ने गृहत्याग कर, उस आश्रम का संचालन संभाला। कृत्रिमता और प्रदर्शन से दूर उस आश्रम में प्रारम्भ में तीन वृद्ध महिलायें, तीन विधवाएँ और दो बाल ब्रह्मचारिणी बहिनें आयी। धीरे-धीरे वहाँ के वातावरण को देखते हुए अन्य महिलायें भी वहाँ रहने लगीं। धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ वहाँ आजीविका के लिए एक सिलाई-कढ़ाई केन्द्र, संगीत, पेन्टिंग आदि की कक्षाएँ प्रारम्भ की गयीं।
उत्साही ट्रस्टियों एवं समाज के सहयोग से वह संस्थान आस-पास के क्षेत्र में आशा का केन्द्र बन गया। धीरे-धीरे वहाँ घरेलू उपयोग की शुद्ध सामग्री भी तैयार होकर बिकने लगी। अनेक लोगों को इससे रोजगार भी मिला। समीप ही दूसरी जमीन लेकर उसका विस्तार होता गया।
महिलाओं का परिसर धार्मिक कार्यक्रमों से गूँजता रहता। प्रातः ४ बजे से रात्रि के दस बजे तक वहाँ गतिविधियाँ चलती ही रहती। आर्थिक व्यवस्था सहयोगी औद्योगिक संस्थान एवं समाज के सहयोग से सहज ही चलने लगी।
वे माताजी एवं बहिन इसे देख-देखकर अत्यन्त संतुष्ट होतीं, परन्तु गहन तत्त्वाभ्यास के बल से इन व्यवस्थाओं से विरक्त-सी रहती।
अन्त में उन माताजी एवं उनके पति भी सर्वस्व समर्पणपूर्वक समाधि को प्राप्त हुए।
आज भी उनकी यशोगाथा वहाँ गूँजती-सी लगती है। रागिनी ने विरागिनी होकर अपनी दृढ़ता एवं लगन से अनेक महिलाओं के लिए राग से विराग का द्वार खोल दिया।
धन्य है ऐसी संयम की भावना, विवेक एवं समर्पण बुद्धि को।

नीयत का कमाल

रामलाल एक गरीब दुकानदार था। गाँव में संतोषपूर्वक अपनी आजीविका करता था। उसकी ईमानदारी की चर्चा गाँव के बाहर भी होती रहती थी। भक्ति व परोपकार की भावना से उसका अंतरंग भरा हुआ था। दूसरों की भलाई के लिए न उस आलस्य था और न अपने नुकसान की परवाह।
एक बार अधिक वर्षा के कारण उसकी दुकान गिर गयी। आजीविका बिगड़ गयी। उसने पास के ग्राम के एक सज्जन सेठ से पाँच हजार रुपये माँगे। उसकी ईमानदारी से परिचित उन सज्जन ने बिना लिखे ही एक वर्ष में लौटाने की बात कहकर उसे रुपये दे दिये।
रास्ते में मन में खोटा भाव आ गया कि सेठ ने रुपये बही में तो लिखे नहीं। वह रुपये नहीं लौटायेगा।
चलते-चलते वह नदी के समीप स्नान के लिए रुका। रुपये की प्लास्टिक की थैली उसने वहीं रख दी। कपड़े पेड़ पर टाँग दिये और नदी में नहाकर, निकल कर देखा तो रुपये की थैली नहीं दिखी। आखिर मिलती किए ? उसके ऊपर तो वहाँ घूमती हुई एक भैंस ने गोबर कर दिया था। उससे वह ढक गयी थी।
उसे अपने खोटे भाव पर बहुत पश्चाताप हुआ। उसने पुनः सेठ से रुपये माँगे तो उन्होंने सहज भाव से फिर दे दिये। अब लौटते हुए वह विचार कर रहा था कि किसी प्रकार सेठ के पूरे दस हजार रुपये निश्चित समय पर लौटाऊँगा।
उसी स्थान पर उसके मन में आया एक बार पुनः देख लूँ। तभी उसका पैर गोबर पर पड़ा जिससे गोबर पसरने से वह थैली दिखने लगी। उसने उठाकर धोई। वह पॉँच हजार रुपये सेठ को तुरन्त वापस कर आया। शेष रुपये उसने समय पर वापस कर दिये और संकल्प किया कि खोटा भाव कभी नहीं करुँगा।
सत्य ही कहा हे कि अपने भले-बुरे भावों का फल जीव को स्वयं ही भोगना पड़ता है।

शील

एक थी घास बेचकर गुजारा करने वाली शीलवती युवती सुशीला। एक ताँगे वाला युवक रामू उससे घास खरीदता था। एक दिन उसने खोटे भाव पूर्वक पैसा देते समय उसका हाथ दबा दिया। उसने संकोचवश कुछ कहा तो नहीं, परन्तु वह दूसरे रास्ते से निकलने लगी।
एक दिन वह युवती घास लेकर जा रही थी। रामू ने घास उसे ही देने के लिए कहा। युवती पहले तो झिझकी, फिर तैयार हो गयी। तब उसने आँगन में घोड़े के पास घास डालने के लिए कहा।, परन्तु जैसे ही वह घास डालने अन्दर घुसी, युवक भी उसके साथ भीतर घुस गया और किवाड़ लगाकर उसके साथ कुचेष्टाएँ करने लगा, परन्तु वह युवती खुरपी लेकर आक्रमण कर बैठी। युवक घबड़ा कर गिर पड़ा। उसने तुरन्त खुरपी से युवक की नाक थोड़ी सी काट दी और किवाड़ खोलकर निकल गयी।
युवक उठा उसने नाक पानी से धोई, उस पर दवा लगाई और अत्यन्त लज्जित हुआ, वह जहाँ भी जाता सब हँसते।
फिर उसने दृढ़तापूर्वक शील की प्रतिज्ञा ही कर ली। अब तो वृद्ध हो चला है, परन्तु आज ताँगा चलाते हुए जब युवक-युवतियों की उत्शृंकल कुचेष्टाएँ देखता है तो उसे वह घटना याद आ जाती है। उसका मन काँप उठता है।

विवेकपूर्ण उदारता

एक थे सद्गृहस्थ। पुण्योदय से न चाहते हुए भी व्यापार बढ़ रहा था। आध्यात्मिक रुचि होने से लक्ष्मी बढ़ने हर्ष उतना नहीं होता था, जितना उससे निवृत्ति का भाव।
स्वाध्याय करते समय विचार करते कि - "धनादि सामग्री तो धूल के समान ही हमारे परिणामों को मलिन करने वाली है, अनित्य है। रास्ते में चलते हुए आ जाने वाली वृक्षों की छाया के समान है। जब तक इसका त्याग नहीं हो पा रहा है, तब तक उसका सदुपयोग कर लेना चाहिए।"
भावना के अनुसार ही एक बार एक ऐसे आध्यात्मतीर्थ पर जाने का सुयोग बना, जहाँ बाह्य धार्मिक रचनायें तो विशेष आकर्षक नहीं थीं। मन्दिर, मुमुक्षु निवास, अतिथिगृह, विद्यालय, छात्रावास, आश्रम आदि अत्यन्त सादगीपूर्ण थे, परन्तु अनेक ब्रह्मचारी भाई, बहिनें, वृद्ध, प्रौढ़, श्रावक, श्राविकाएँ धर्म साधन कर रहे थे। बच्चे भी आकर अध्ययन एवं धार्मिक संस्कार ले रहे थे।
प्रातः ब्रह्ममुहूर्त से रात्रि दस बजे तक वहाँ प्रार्थना, आध्यात्मिक पाठ, तत्त्वचर्चा, सामायिक एवं ध्यान का अभ्यास, पूजा, स्वाध्यायादि कार्यक्रम अत्यन्त व्यवस्थित चलते थे। उनके आवास, भोजन, चिकित्सा आदि की समुचित व्यवस्था थी।
परस्पर में वात्सलय, सेवाभावादि प्रत्यक्ष ही देखने को मिलते थे अर्थात् धर्मचर्चा के साथ यथायोग्य नियम, संयम, वैराग्यभावना भी सहज ही वर्तते थे। चित्त को संतोष हुआ। अल्प प्रवास था।
यह स्थान चंचला लक्ष्मी के सदुपयोग के योग्य तो है ही, जीवन को सार्थक बनाने के लिए भी योग्य है, ऐसी भावना लेकर लौटे।
वहाँ वात्सल्य एवं व्यवस्था तो मिली, परन्तु दानादि की कोई अपील या विज्ञापन भी नहीं था। आश्चर्य हुआ कि इतनी व्यवस्था कैसे चलती होगी ? घर आकर सम्पर्क किया, जानकारी मिली, परन्तु निस्पृहतापूर्वक निवेदन किया - “इस व्यवस्था में मुझे भी सौभाग्य मिल सकता है ?”
उत्तर मिला - " सब आपका ही है, हम तो व्यवस्था के निमित्तमात्र हैं। बच्चा जन्मता है तो माँ के आँचल में स्वयमेव बच्चे के भाग्योदय से दूध आ जाता है। उसी प्रकार सभी के भाग्य से सामग्री स्वयमेव आ जाती है।
आपका व्यापार क्या है ? हम लोग हिंसक एवं निंद्य व्यापार से उपार्जित आय में से दान स्वीकार नहीं करते, जिससे कि साधकों का मन विकृत न हो। सादगी और संतोष ही हमारी साधना का मूल है।"
सुनकर मन प्रसन्न हुआ।
तत्त्वज्ञान के अभ्यास का फल तो निश्चिंतता एवं शान्तता ही है।
उन्होंने एक बड़ी राशि अत्यन्त विनम्रतापूर्वक अहोभाव सहित ट्रस्ट के खाते में डाल दी और भविष्य में भी इसी प्रकार सहयोग करते रहने की भावना व्यक्त की।
प्रसंग को सुनकर लगा कि **आज भी ऐसे निस्पृही लोग और उदार दातार हैं, जिन्हें किसी प्रकार के सम्मान की चाह न होते हुए, मात्र अपने धनादि के सदुपयोग की भावना रहती है। **
ऐसी भ्रान्ति अविवेकी लोगों को ही होती है कि बिना नाम, सम्मान या प्रदर्शन के धन देने वाले आज नहीं हैं।

भावों का फल

एक साधक निस्पृह भाव से चले आ रहे थे। रास्ते में गन्ने के खेत, गुड़ बनाने की भट्टियाँ तथा गन्ना और गुड़ से भरी बैलगाड़ियाँ दिखाई दीं। अचानक विकल्प आया, कितनी कैसी भीनी-भीनी गन्ध आ रही है ? कैसा अच्छा व्यापार ? वहीं एक ओर बैठ कर सामायिक करने लगे, परन्तु मन बार-बार गन्ने और गुड़ की भरी गाड़ियों की ओर जा रहा था। उसी समय गति बंध हुआ और वे मरकर बैल बन गये। फिर तो वैसे ही गन्ने और गुड़ से भरी गाड़ी खींचने लगे।
एक दिन ुइ रास्ते में विहार करते हुए दिगम्बर मुनिराजों का संघ दिखा। उनके दर्शन करते हुए बैल को भावविशुद्धि हुई तथा जातिस्मरण हुआ। आँखो से टप-टप आसूँ गिरने लगे। अपनी साधक दशा याद आई। परिणामों का फल देखते हुए बाह्य संसार से चित्त भयभीत एवं विरक्त-सा हुआ।
जैसे ही उसे गाड़ी से खोला गया। वह शीघ्रता से मुनिसंघ की ओर भागने लगा। पीछे से उसका मालिक भाग रहा था पकड़ने के लिए।
बैल मुनिराज के समीप ही चरणों में सिर झुका कर बैठ गया। सभी आश्चर्य से देख रहे थे। मालिक ने आकर पुचकारा, परन्तु वह उठने का नाम नहीं ले रहा था। समझ गया कि इसे पूर्वभव का स्मरण हुआ है और यह विरक्त हो गया है।
उसने अनुमोदना करते हुए एक धार्मिक व्यक्ति को साथ में कर दिया जो उसे भोजन-पानी कराता रहता और वह मुनिराज का प्रवचन सुनता और तत्त्वचिन्तन करते हुए अपनी विशुद्धि बढ़ा रहा था।
एक दिन उसी प्रकार धर्मसाधना करते हुए उसने समताभाव-पूर्वक उसकी देह छोड़ दी।
श्रावकों ने और उसके मालिक ने भी स्वयं आकर समीप की बड़ी नदी में अत्यन्त सम्मान-पूर्वक उसकी देह का विसर्जन करके एक सुन्दर शान्ति-विधान का आयोजन किया।

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क्रोध

एक किसान अपने खेत के समीप ही झोपड़ी में रहता था। फसल पक कर तैयार खड़ी थी। वही एक कुत्ता प्रायः उसकी रोटियाँ उठा ले जाता, कभी दूध पी जाता। किसान को गुस्सा आता। एक दिन उसने कुत्ते को पकड़कर, पूँछ में कपड़ा लपेटकर, तेल डालकर आग लगा दी और कुत्ते को छोड़ दिया। कुत्ता घबड़ा कर भागा और सरसों की पकी तैयार फसल वाले खेत में घुस गया। सारी फसल जल कर नष्ट हो गयी।
कुत्ता तो भागता हुआ ट्यूबवेल के पास भरे पानी में बैठ गया। उसकी आग बुझ गयी। धीरे-धीरे उसकी पूँछ भी ठीक हो गयी।
किसान को अपने क्रूर परिणामों की सजा मिल गयी।