लघु बोध कथाएं - ब्र. रवीन्द्र जी 'आत्मन्' | Laghu Bodh Kathayen

खाली मन

एक नवयुवक संतोष ने सत्समागम का निमित्त पाकर, ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया। दूसरे लोगों को देख-देखकर वह जप,पाठ, पूजा,स्वाध्याय आदि करने लगा, परन्तु उसके मन में यही भाव चलते रहते कि एक सुन्दर और सुविधा युक्त भवन बन जाये। कुछ फण्ड और अन्य आमदनी हो जाये। उसके लिए कुछ धार्मिक आयोजन कर लें।प्रचारक एवं कर्मचारी, गाड़ी आदि साधन हो जायें। विश्व में ख़ूब ख्याति हो जाए; अतः उसके चित्त में शान्ति नहीं थी।
एक दिन वह बाजार से निकल रहा था। मार्ग में पूर्व के परिचित मित्र की दुकान मिली। मित्र ने बुलाया और वह भी स्नेहवश दुकान में भीतर जाकर बैठ गया।उसकी किराने की दुकान में अनेक छोटे-बड़े डिब्बे लगे थे। वहां खाली डिब्बे भी थे। उन्हें देखकर कौतूहलवश उसने पूछा- " इनमें क्या है?"
मित्र ने बताया- “आतमराम है।”
उसने तो ग्रामीण दुकानदारी की भाषा में कहा, परन्तु वह ब्रह्मचारी युवक विचारने लगा कि मित्र ठीक ही तो कह रहा है कि जो खाली होते हैं, उनमें आतमराम होता है। मेरा मन भी जब इन बाह्य विकल्पों से खाली होगा, तभी परमात्मा का ध्यान हो सकेगा।
सचेत होकर वह लग गया बाह्य विकल्पों को छोड़कर,समता की साधना और आत्मा की आराधना में, निस्पृह भाव से। अब उसकी परिणति बदल चुकी थी। संतोष,समता एवं शान्ति उसकी पावन मुद्रा से ही दिखती थी।

3 Likes

कष्टकारी छल

खेत में फसल पक रही थी। इस वर्ष मौसम के सहयोग से फसल भी अच्छी थी। किसान हरि, फसल की रक्षा के लिए वही सोता था।
एक रात्रि को चोरी करके चोर, उधर से निकल रहे थे। उसने अपनी बड़ी टॉर्च से गाड़ी की सायरन जैसी आवाज एवं रोशनी, दूसरी ओर फेंकी। चोर समझे कि कोई गाड़ी आ रही है, वे धन को खेत में फेंककर भाग गये।
हरि उतरा, उसने इकट्ठा कर मचान के निचे गाढ़ दिया।कुछ दिनों बाद वे ही चोर उधर से फिर निकले।उसने वैसा ही किया। चोर इधर उधर देखने लगे और तो कोई दिखा नहीं, किसान दिख गया। उन्होंने उसे पकड़ कर मारा और पिछला धन भी निकल ले गये।
हरि दुःखी होता हुआ विचारने लगा - "लोभवश किसी को धोखा देने का दुष्फल जीव को स्वयं ही भोगना पड़ता है मेहनत से प्राप्त, भाग्य प्रमाण सामग्री में ही संतोष करना हितकर है।"
अंत में हरि ने फिर कभी ऐसा न करने की प्रतिज्ञा कर ली और संतोषपूर्वक रहने लगा।

3 Likes

कटु वचन

हरेन्द्र अपने मित्र देवेन्द्र के यहां गया। वहां उसका उत्साहपूर्वक स्वागत हुआ। नाना मिष्ठान एवं पकवान बनाये गये। भोजन के बाद सुन्दर बिस्तरों पर आराम कराया। मंहगी भेंट आदि दी गयी, परन्तु चलते समय वहीं खड़ी देवेन्द्र की पत्नी ने हंसी करते हुए कुछ अयोग्य वचन कह दिए-" तुम्हें घर पर ऐसे भोजन कहां मिलते होंगे?"
स्वाभिमानी हरेन्द्र को बहुत बुरा लगा और उसने वहां भविष्य में न आने का नियम ही ले लिया।
वास्तव में कटु वचन,स्नेह को भंग करने वाला महादोष है। कठोर एवं निंद वचनों द्वारा अगणित विसम्वाद एवं संघर्ष होते देखे जाते हैं।
सावधान! मौन रहो या योग्य हित-मित-प्रिय वचन बोलो।

2 Likes

नैतिक शिक्षा

एक काॅलेज के प्राचार्य नवीनचंदजी नैतिक विचारों वाले योग्य प्रशासक थे। उनके बंगले में आम, अमरूद, अनार के पेड़ थे और कुछ टमाटरादि सब्जी की क्यारियां थी। काॅलेज की भी बहुत-सी जमीन में खेती होती थी।

लड़के खेत में से भी कभी गन्ना, चना, मटर आदि चोरी से खा लेते थे। उनके द्वारा कई बार समझाने पर भी चार-छह लड़के नहीं माने। एक रात्रि लड़कों ने चोरी से बंगले के पेड़ से कुछ आम खाये, कुछ पता नहीं चला और चौकीदार भी सोता रहा।
परन्तु प्रात: प्राचार्यजी अनशन पर बैठ गये। एक दिन तो कोई कुछ न बोला। दूसरे दिन लड़के चौकीदार के समीप पहुंचे तो वह बोला-“अब क्यों आये हो? मैं तो तब ही जाग गया था, जब तुम लोग घुस थे और फल तोड़ना प्रारम्भ किया था, परन्तु साहब ने मुझे इशारे से मना कर दिया।”
लड़के घबराये । विचारा कि- साहब को सारी जानकारी है। चुपचाप ऑफिस में पहुंच कर पैर पकड़ कर रोते हुए क्षमा मांगने लगे।
साहब- " माता-पिता किस आशा से पढ़ते भेजते हैं। यदि नैतिकता ही नहीं सीख सके तो अन्य शिक्षा से क्या होगा ? भ्रष्टाचार बढ़ाओगे । अपना अहित तो करोगे ही, समाज और देश के भी पतन के कारण बनोगे।
विषय का ज्ञान तो उसी क्षेत्र में काम आता है, परन्तु नैतिकता (ईमानदारी, कर्त्तव्यनिष्ठा, विनय, सेवा भावना) तो सर्वत्र काम आती है। इसी से तो व्यक्ति और देश की प्रतिष्ठा बढ़ती है। विषय के ज्ञान का भी सदुपयोग होता है।"
उसके पश्चात काॅलेज में कभी इस प्रकार के चोरी आदि के प्रसंग नहीं बने। प्राचार्यजी का समय-समय पर नैतिकतापूर्ण सम्बोधन, काॅलेज की पहिचान ही बन गया।

2 Likes

परोपकार

एक युवक योगेश, अपनी माँ के साथ रहते हुए गरीबी के दिन काट रहा था। पिताजी छोटेपन में ही परलोक सिधार गये थे। एक दिन माँ ने कहा -“दूर जंगल में स्थित मन्दिर में एक देव रहता है, उससे गरीबी दूर करने का उपाय पूछ कर आओ।”
योगेश चल दिया, परन्तु रात्रि होने से एक गाँव में एक घर में ठहर गया। वहाँ गृहस्वामी ने अतिथि समझ कर सुलाया और बातें करते हुए कहा -“मेरा भी एक प्रश्न देव से पूछ कर आना की मेरी युवा लड़की बोलती नहीं है, वह कब बोलेगी या नहीं बोलेगी ?”
आगे चलकर सांयकाल दूसरे गाँव में रुक गया। एक बाग के स्वामी ने अपना प्रश्न पूछ कर आने के लिए कहा कि उसके एक आम के पेड़ की वृद्धि क्यों नहीं होती ?
योगेश चलते हुए तीसरे दिन मन्दिर में पहुँच गया। वहाँ पूजा भक्ति करने के बाद बैठा ही था कि देव ने कहा -“मात्र दो प्रश्न पूछ सकते हो।” तब उसने पहले बाग के स्वामी का प्रश्न पूछा।
उसके उत्तर में देव ने कहा -“उसी पेड़ की जड़ों के समीप, धन के कलश है, उन्हें निकालो तब वृक्ष बढ़ेगा और फलेगा।”
दूसरा प्रश्न पूछने पर कहा -“वह लड़की उसके पति का मुख देखकर बोलने लगेगी।” योगेश अपना प्रश्न पूछे बिना ही चल दिया। बाग में आकर उसके कहने से वहाँ खोदने पर चार कलश निकले। तब प्रसन्न होकर बाग के स्वामी ने दो कलश उस युवक को दे दिए।
दूसरे गाँव आने पर वह उत्तर बता ही रहा था कि वह लड़की आकर बोलने लगी। तब गृह स्वामी ने उस युवा के साथ उसका विवाह कर दिया। सम्मान सहित योग्य सामान भी दिया और गाड़ी से उसे उसके घर पहुँचाया। माँ देखकर प्रसन्न हुई तथा उसने कहा -"यह तुम्हारी स्वार्थ-त्याग और परोपकार-वृत्ति का ही फल है; अतः जीवन में धैर्य और धर्म कभी नहीं छोड़ना।"

3 Likes

सिद्धान्त और प्रयोजन

एक महिला एक बार प्रवचन सुनकर आयी-“समस्त परिणमन स्वतंत्र होता है, कोई किसी का कर्त्ता नहीं है। बाह्य-सामग्री पुण्य के उदय से मिलती है।”
कथन की अपेक्षा और प्रयोजन को समझे बिना, वह घर पर लेटे हुए विचार करने लगी कि मैं उठकर काम क्यों करूँ ? थोड़ी देर बाद उसे भूख लगी। उसकी समझ में कुछ न आया। वह उन्हीं पण्डितजी के समीप पहुँची और बोली-
“मेरे घर का कुछ तो मेरे बिना किये हुआ नहीं। न चूल्हा जला और न भोजन बना।”
तब पण्डितजी ने कहा- “बेटी ! एक कार्य में अनेक कारण होते हैं। हमें योग्य पुरुषार्थ करना चाहिए। फिर कार्य हमारे विकल्प के अनुसार हो जाये, तब भी मिथ्या अहंकार नहीं करना चाहिए और न हो पाये तो भी आकुल होकर दूसरों को दोष नहीं देना चाहिए।
हमें अपने कार्य के लिए भी दूसरों के भरोसे नहीं बैठे रहना चाहिए, परन्तु भूमिकानुसार निमित्त-नैमेत्तिक सम्बन्ध को भी भलीप्रकार समझकर योग्य प्रवर्तन करना ही हितकर है।
’योग्यतानुसार कार्य होता है’ - ऐसा सांगोपांग बिना समझे, हमें प्रमादी या स्वच्छंद नहीं होना चाहिए और न अपनी इच्छानुसार परिणमन की आशा ही करनी चाहिए।
इच्छानुसार परिणमन तो हमारे पुण्योदय में सहज ही होता दिखाए देता है और प्रतिकूल परिणमन भी पाप के उदय में होता देखा ही जाता है ; इससे भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए। विषय को सांगोपांग समझे बिना भ्रम नहीं मिटता और राग टूटे बिना विकल्प नहीं मिटते।”
उस स्त्री की समझ में कुछ-कुछ आया और उसने स्वाध्याय का नियम ही ले लिया और वस्तु के अनेकांतमयी स्वरूप को समझने में लग गयी।

5 Likes

क्षमा और चमत्कार

सेठ लखपतराय ने व्यापार के लिए अपने घनिष्ठ मित्र सुखदेव के पुत्र धनदेव को पाँच लाख रुपये दे दिये; जिससे धीरे -धीरे उसका व्यापार भी जम गया और पूँजी भी हो गयी, परन्तु धनदेव की नीयत रुपया लौटाने की नहीं हुई।
एक बार माँगते समय काफी कहा - सुनी हो गयी, तब से परस्पर आना-जाना और बोलना भी बन्द हो गया ; जबकि धनदेव का घर सेठ लखपतराय की दुकान से घर के रास्ते में ही पड़ता था।
लगभग दस वर्ष हो गये। सेठजी के मन में धन की हानि की अपेक्षा सम्बन्ध बिगड़ने और अन्तरंग में बैर की गाँठ पड़ जाने का दुःख अधिक था।
एक बार दशलक्षण पर्व पर उनका मन किसी सिद्धक्षेत्र पर जाने का हो गया, जिससे बारह दिन व्यापार एवं घरेलू उलझनों से निवृत्ति मिले और मन को कुछ शान्ति मिले।
‘जहाँ चाह है वहाँ राह मिलती है’ के अनुसार नगर के दूसरे साधर्मीजनों के साथ वे श्री सोनगिरजी पहुँचे। वहाँ वंदना,पूजनादि के साथ प्रवचन सुनने का लाभ भी मिल गया। प्रवचन तो वे कभी-कभी अपने नगर में भी सुनते थे, परन्तु वहाँ निवृति न होने से न तो मन एकाग्र होता था और न प्रवचन का मनन करने के लिए समय मिल पाता। यहाँ वे बाधाएँ नहीं थीं; अतः अच्छे दिन बीते, परिणाम भी भीगे। अन्त में क्षमावाणी के अवसर पर प्रवचन सुनते-सुनते ही भीतर-भीतर रोते से रहे। पश्चात्ताप हुआ - मैंने व्यर्थ ही अनित्य धन के चक्कर में अपने परिणाम मलिन किये।
प्रवचन के बाद श्रीयुत पंडितजी से मिलने उनके आवास पर पहुँचे और बोले- " यद्धपि मुझे कषाय होने का दुःख तो हो रहा है, परन्तु अपनी भूल समझ में नहीं आ रही।"
पण्डितजी -
१. तुमने वस्तु के स्वतन्त्र परिणमन का विचार नहीं किया।
२. अपने उदय का विचार नहीं किया।
३. कषायों से होने वाले दुःख और कर्मबन्ध का विचार नहीं किया।
४. धन और जीवन की असारता का विचार नहीं किया।
५. चेतन की अपेक्षा अचेतन धन को अधिक महत्त्व दिया
६. पुराणपुरषों की क्षमा, उदारता आदि का विचार नहीं किया।
सेठजी कुछ सोचने लगे।
पण्डितजी-“उस लड़के के प्रति समस्त दुर्भाव छोड़ो और मिष्ठान्न लेकर, उसके पास जाकर यही कहना कि बेटा! सारी गलती मेरी है, अब क्षमा करो।”
सेठ की समझ में आ गया। वे लौटकर सीधे धनदेव के घर पहुँचे। भोजन का समय था। धनदेव का लड़का द्वार खोलकर देखते हुए खुशी से बोलने लगा -“पापाजी पड़ोस वाले ताऊजी बाबा आए है।”
तब तक वे आँगन में पहुँच गए। मिष्ठान्न मेज पर रखकर बोले -“बेटा सारी गलती मेरी है, अब क्षमा करो।”
इतना कहकर धनदेव तिजोरी से पाँच लाख रुपये लेकर आया और सेठ को देने लगा; परन्तु सेठ ने इन्कार कर दिया और बोले - मैं तो क्षमावाणी मनाने आया हूँ, रुपए लेने नहीं।
धनदेव के अति आग्रह करने पर सेठ ने अपनी ओर से पाँच लाख रुपये मिलाकर एक परोपकार फण्ड बनाने की घोर कर दी।
धनदेव हर्ष विभोर होते हुए बोला -“पाँच लाख मेरे भी इसमें और मिला लें और एक स्थायी ट्रस्ट बनाकर उसमें अपने व्यापार से होने वाली आय का भी पाँच प्रतिशत निरन्तर देते रहेंगे, जिससे धार्मिक, नैतिक शिक्षा, असहाय-सहयोग, चिकित्सा सहयोग आदि कार्य होते रहेंगे।”
सेठजी ने प्रसन्न हो उसे गले से लगा लिया। सबने प्रसन्नता से भोजन किया। फिर तो वे धर्म कार्यों एवं लोकापकार के कार्यों में होड़पूर्वक वात्सल्य भाव से प्रवर्तन लगे। धनदेव को आज धन की सार्थकता समझ में आ गई थी। जिसने भी सुना और देखा, सहज भाव से धन्य-धन्य कह उठा।

4 Likes

क्रोध का फल

एक बीस वर्ष का लड़का, घर पर ही मशीन से अपना कपड़ा सिल रहा था। उसका धागा उलझ गया। उसे गुस्सा आया उसने मशीन में जोर से लात मारी, जिससे मशीन गिर कर टूट गयी। साथ ही सन्तुलन बिगड़ने से वह भी उसी पर गिर गया। उसकी आँख में चोट लग गयी।
माँ आवाज सुनकर आयी। तुरन्त उपचार किया, परन्तु आँख में घाव था; अतः डॉक्टर के यहाँ ले गये। उसने थोड़ा उपचार कर बड़े अस्पताल भेज दिया। वहाँ महीनों इलाज चला, तब कहीं आँख ठीक हो पायी। माँ के समझाने पर उस बालक ने फिर से क्रोध न करने की प्रतिज्ञा ही कर ली।
जरा-सा धैर्य खो देने से कितना कष्ट हो सकता है और कितने कर्म बँधते है। विचार कर सावधान हो।

2 Likes

हठी बालिका

एक दस वर्ष की लड़की, लाड़ में कुछ हठी हो गयी थी। घर सड़क के किनारे था। माँ के मना करने पर भी बार-बार सड़क पर निकल जाती। एक बार तेज वाहनों के बीच एक मोटर सायकल से टकरा गयी। पैर की हड्डी टूट गयी। थोड़ी चोट पसली में भी लग गयी।
यधपि उपचार से ठीक यो हो गयी,परन्तु दस-बारह दिन स्कूल न जा पाई। परीक्षा का समय समीप था। परीक्षा में पास तो हो गयी, परन्तु अंक कम आये। वह रोने लगी। उसकी अध्यापिका ने समझाया- “हमें सदैव बड़ो की बातों पर ध्यान देना चाहिए। इसमें अपना ही लाभ है।”
फिर तो उसने हठ न करने की प्रतिज्ञा ही ले ली।

2 Likes

संस्कारों का प्रभाव

एक लड़का सुबोध, कक्षा चार में पढ़ता था। वह रात्रिकालीन धार्मिक पाठशाला में भी अवश्य जाता था। बुद्धिमान तो था ही,शीघ्रता से किसी भी विषय को समझ लेता था।
एक बार सांयकाल घूमते हुए, घर से कुछ अधिक दूर निकल गया। उसे कुछ डाकू मिल गये, वे उसे घर में बन्द करके रखते। सुबोध के घर दस लाख रुपयों की माँग की गयी। घर के लोग चिंता में पड़ गये।
सुबोध वहाँ भी प्रातः शीघ्र उठकर, णमोकार मंत्र एवं मेरी भावना, बारह भावना, आत्मकीर्तन आदि अत्यन्त मधुर स्वर में पढ़ता एवं भगवान की भक्ति करता।अपने ही पूर्व कर्मोदय का विचार करते हुए, समता रखने का प्रयास करता। फिर भी कभी-कभी घर और पाठशाला की याद आ जाने से रोना आ ही जाता था।
वहाँ का खान-पान ठीक न होने से, दो दिन तो उसने कुछ खाया ही नहीं। उसे देखकर उस डाकू की बूढ़ी माँ को अत्यन्त दया आयी। अकेले में उन्होंने लड़के के समीप जाकर उसका परिचय पूछा और उसे धर्मात्मा जानकर, उसके अनुसार बर्तन माँजती, पानी छानती और बहुत स्वच्छ्ता से भोजन बनाती और उसे दिन में ही खिला देती उसकी पाप, पुण्य, धर्म की चर्चा सुनकर वे बड़ी प्रसन्न होतीं।
एक दिन उन्होंने अपने डाकू बेटे के बाहर से लौट कर आने पर सारी चर्चा सुनाई। तब उसने परीक्षा के लिए लड़के के सामने बन्दूक तान कर कहा- “तेरे पिताजी रुपया तो भेज नहीं रहे; अतः मैं तुझे गोली मारता हूँ।”
देह से भिन्न आत्मा को समझने के बल से उसने अपनी कमीज उठाकर, पेट खोलते हुए निडर होकर कहा -“मार दो, शरीर ही तो मरेगा; आत्मा तो अजर अमर है।”
यह सुनकर डाकू का ह्रदय बदल गया। वह विचारने लगा -“कहाँ तो यह छोटा लड़का और कहाँ मैं ?”
उसने मन ही मन संकल्प किया और लड़के के पैर छूकर चोरी, शराब, माँस,
जुआ, आदि का त्याग कर दिया। फिर उसके पिताजी और पाठशाला के अध्यापक को बुलाकर,
उसने क्षमा माँगते हुए लड़के को सौंप दिया।
उसने सुबोध के पिताजी के सहयोग से गाँव में एक दुकान प्रारम्भ कर दी तथा शिक्षण-शिविरों में जाकर धर्मलाभ लेने लगा। उसे ज्ञान-वैराग्य का ऐसा रस लगा की एक दिन उसने घर छोड़ दिया और सत्समागम में रहते हुए स्वयं ज्ञानार्जन किया और गाँव-गाँव में भ्रमण कर नैतिक शिक्षा एवं धार्मिक शिक्षा की पाठशालाएँ खुलवाई।
इसप्रकार एक संस्कारित बालक की दृढ़ता के निमित्त से अनेक लोगों का कल्याण हुआ।

3 Likes

सही पुरुषार्थ

एक युवक रघुवीर, मजदूरी करके अपने कुटुम्ब का पालन करता था। उसे कुसंगति के कारण बीड़ी पीने और गुटका खाने की आदत पड़ गयी। कुछ वर्षो तक तो उसे मालूम नहीं पड़ा। धीरे-धीरे उसका मुँह खुलना काम हो गया। डॉक्टर को दिखाने पर मालूम पड़ा कि कैंसर का प्रारम्भ हो गया है। यह जानकर वह अत्यन्त घबराया और चिन्तित हुआ।
सौभाग्य से वह जैन विद्यालय में मजदूरी करने गया। वहाँ नैतिक शिक्षा शिविर लगा था। उसमें विद्वान एवं कई चिकित्सक आये थे। उसने उनके व्याख्यान सुने। उसका मनोबल बढ़ा और उसने वहीं बीड़ी, गुटका आदि का त्याग कर दिया। चिकित्सक के परामर्श से सौम्य ओषधियों एवं भोजन सुधार से, उसने अपने शरीर का शोधन किया। पन्द्रह ही दिनों में उसे अत्यन्त लाभ प्रतीत हुआ। वह उत्साह से प्रातः शीघ्र उठता। भगवान का स्मरण एवं एवं मेरी भावना आदि का पाठ करता। फिर मिट्टी-पानी की चिकित्सा,उबली सब्जियाँ, रोटी आदि लेता। प्रसन्नता से अपना कार्य करता। विद्यालय संचालक ने भी उसको स्थाई कर्मचारी के रुप में रख लिया था। वे उससे भरी काम नहीं कराते। उसे पुस्तकालय से अच्छी पुस्तकें भी पढ़ने को देते।
लगभग दो माह बाद उसने जाँच करायी तो उसे प्रसन्नता भी हुई और आश्चर्य भी। उसके कैंसर की संभावना समाप्त हो चुकी थी। लगभग छह माह में पूर्ण स्वस्थ हो गया।
अब वह और उसका परिवार, जैन विद्यालय को अपनी जन्मभूमि मानता। जहाँ भी अपनी सेवाएं देता। माँसहार, नशा और जुआ आदि का त्याग करने के अभियान चलाने वाली समिति की ओर से वह इसी पुनीत कार्य में समर्पित होकर लगा रहता। इनकी बुराइयों को बहुत अच्छी तरह समझाकर सामने वाले को इन दुर्व्यसनों का त्याग करने के लिए तैयार कर ही लेता।

3 Likes

टी.वी. के दुष्परिणाम

बैंक मैनेजर संदीप, माता-पिता से दूर सर्विस करता था। उसने पहले तो पत्नी के आग्रह से आग्रह से टी.वी. खरीद ली और कभी-कभी स्वयं भी देख लेता।
परन्तु कुछ दिनों के बाद उसे टी.वी. देखने का व्यसन हो गया। ऑफिस से आकर टी.वी. देखने बैठ जाता। भोजन भी वही टी.वी. देखते-देखते करता। कुछ अश्लील फिल्में भी देख लेता; अतः चित्त चंचल रहता। बच्चों पर भी ध्यान नहीं दे पाता। बच्चे भी टी.वी. देखने बैठ जाते। घर के कार्य भी समय पर नहीं हो पाते। रात्रि को देर से सोने के कारण कब्ज रहने लगा। आँखों पर भी दुष्प्रभाव हुआ, जलन पड़ने लगी। चश्मे का नम्बर भी बढ़ता जा रहा था। मस्तिष्क भारी-भारी रहता। स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया।
अब तो घर पर पत्नी और ऑफिस में कर्मचारी परेशान रहने लगे। वह स्वयं टेंशन में (तनाव-ग्रस्त) रहने लगा सौभाग्य से उसका एक सहपाठी मित्र अरुण आया। उसका प्रसन्न चेहरा और अच्छा स्वास्थ्य उसे बहुत सुहावना लगा। बातचीत में स्थिरता, मधुरता उसे बहुत अच्छी लगी।
अरुण में बताया वह दैनिक स्वाध्याय करता है। दूसरे दिन वह उसी नगर के जिनमंदिर में चलने वाली स्वाध्याय गोष्ठी में संदीप को ले गया। प्रवचनों से प्रभावित होकर उसने एक दिन टी.वी. देखने का त्याग ही कर दिया।
वह अच्छी पुस्तकों एवं शास्त्रों के अध्धयन में अपना समय लगा। अब वह जल्दी उठता। प्रातः की शुद्ध वायु और शुद्ध चिन्तन उसके लिए अमृत-तुल्य भासित हुआ। शीघ्र स्नानादि करके प्रवचन में पहुँचता। वहाँ से आकर प्रसन्नता से सात्त्विक भोजन करता। ऑफिस के कार्य में मन लगने लगा। ईमानदार से अच्छा कार्य करने से प्रतिष्ठा भी बढ़ी।
घर के कार्यों एवं बच्चों की पढ़ाई एवं संस्कारों पर ध्यान देने से परिवार का वातावरण भी सुधर गया।
फिर तो वह टी.वी. के दुष्परिणामों पर लेख लिखकर पत्रिकाओं एवं समाचार-पत्रों में भेजता। जहाँ भी भाषण का अवसर मिलता वह उसकी चर्चा अवश्य करता।

4 Likes

मोबाईल का दर्द

एक फैक्टरी मालिक राघवेन्द्र का जीवन अत्यन्त व्यस्त था। उसके मोबाईल फोन का स्विच कभी बन्द नहीं रह पाता। भोजन करते समय भी वह खाली नहीं रह पाता, दो चार फोन आ ही जाते। सोते समय भी तकिया के पास मोबाईल रहता। नींद से उठ कर फोन पर बातचीत करता रहता।
पत्नी ने कई बार समझाया, परन्तु वह न माना। अन्त में सिरदर्द रहने लगा। उसके ऊपर भी वह ध्यान न देता। दर्द निवारक गोलियाँ खा-खाकर काम करता रहता।
एक बार भयंकर दर्द हुआ। गोलियाँ भी काम नहीं कर रही थीं। जाँच कराने पर मालूम हुआ कि मष्तिष्क में ट्यूमर हो रहा है।
घबराया और सावधान हुआ। चिकित्सक की सलाह के अनुसार मोबाइल पर बातचीत करना बन्द किया।
भाग्य से उसे एक आध्यात्मिक आरोग्य सदन का पता लगा। वहाँ उसने जाकर छह माह चिकित्सा ली। एकान्त मिलने पर उसने आत्मा-परमात्मा, धर्म आदि पर विचार किया। धन की असारता को समझा। तब उसे बचपन में दी जाने वाली दादी माँ की शिक्षायें याद आने लगी।
१. 'न्याय से कमाओ, विवेक से खर्च करो व सन्तोष से रहो।'
२. आवश्यकता से अधिक कमाना भी भूख से अधिक खाने के समान हानिकारक है।
उसने ठीक होने के बाद व्यापार को सीमित किया, चर्या को सुधारा और व्यवस्थित किया। धर्म एवं परोपकार में भी ध्यान दिया। फिर तो उसे शान्ति भी मिली और यश भी।

4 Likes

चोरी

एक तेरह वर्ष का बालक स्कूल से लौट रहा था। उसे रास्ते में सड़क किनारे एक मोबाइल की सिम मिली। उसने उठा कर अपने मोबाइल में डाल ली। उसमें बैलेन्स भी था। उसने किसी से यह बात कही भी नहीं।
परन्तु उस मोबाइल वाले ने उसकी चोरी की रिपोर्ट लिखा दी थी; अतः जैसे ही उसने उस सिम का उपयोग किया, तुरन्त बात पकड़ी गयी।
पुलिस आयी और उसे पकड़ कर ले गयी। उससे पूछा गया, तब उसने रोते हुए सच बता दिया। कोतवाल ने उसे सीधा बच्चा समझ छोड़ तो दिया, परन्तु उसे बहुत बुरा लगा और उसने नियम ले लिया-
‘किसी की पड़ी हुई वस्तु भी नहीं उठायेगा। यदि संभव हुआ तो उसके मालिक तक पहुँचायेगा या थाने में जमा करा देगा। स्वयं के उपयोग में कदापि नहीं लेगा।’

5 Likes

मातृत्व

एक गाँव में एक विधवा स्त्री का इकलौता २० वर्ष का लड़का था। उसका नाम मनोज था। लगभग तीन एकड़ खेती थी। आराम से गुजर हो जाती थी।
उसके समीप ही एक किसान का घर था, उसके भी २ लड़के थे। एक लड़का अशोक तो उस लड़के के साथ ही खेलता। एक दिन खेत पर दोनों लड़को में कहा-सुनी हो गयी। बात बढ़ गयी और गुस्से में अशोक ने बड़ा-सा पत्थर मनोज के सिर में फेंककर मर दिया, जिससे उसका सिर फट गया और शीघ्र ही वह मर गया।
पुलिस आयी और अशोक को पकड़कर ले गयी। दोनों घरों में शोक छा गया एक माह बाद केस का बयान, गवाह आदि होकर फैसला होना था। उस विधवा स्त्री को दूसरे दिन अदालत में बयान देने थे। उसने शान्त होकर विचारा और सो गयी। दूसरे दिन स्नान करके भगवान के दर्शन किये और अदालत पहुँच गयी। उसकी मुद्रा अत्यन्त गम्भीर एवं शान्त थी।
न्यायाधीश द्वारा पूछे जाने पर बोली - "अशोक और मनोज तो अच्छे मित्र थे। अशोक मनोज को कदापि नहीं मार सकता। कोई और ही लड़का पत्थर मार कर भाग गया। अशोक तो वह से निकल रहा था और लोगों ने अशोक को ही हत्यारा समझ लिया। "
पुलिस के वकील ने उसे उसके पिछले बयानों की याद दिलाई तो उसने कहा -“उस समय मैं पुत्र की मृत्यु के शोक में होश खो बैठी थी। पता नहीं मेरे मुख से क्या निकल गया। मुझे ध्यान नहीं हैं, परन्तु मैं जो इस समय कह रही हूँ वही सत्य है। अशोक निर्दोष है।”
अदालत ने अशोक को बरी (मुक्त) कर दिया।
वह विधवा स्त्री वहाँ से आकर घर के चबूतरे पर बैठी ही थी कि गाँव के अन्य लोग,सरपंच आदि आ गये और बोले -“तुमने ऐसा क्यों कहा ?”
स्त्री - "मैंने जब शान्त चित्त से विचार किया कि मेरा पुत्र तो लौट कर आयेगा नहीं, मेरा घर तो उजड़ ही गया। अशोक को फाँसी हो जाने से उसकी माँ भी दुखी होगी। मुझे क्या लाभ ? मैं इतने दिनों से रात्रि में अशोक की माँ का रोना सुनती रहती थी। मैंने उसे बचाने का निश्चय कर लिया। मैंने एक माँ का कर्त्तव्य मात्र किया है।
सभी धन्य-धन्य कह उठे। सरपंच सहित सभी ग्रामवासी चरण छूते हुए बोले - “आज से आप समस्त ग्राम की माँ है, हम सभी आपकी सेवा करेंगे।”
इतने में अशोक भी छूट कर दौड़ा-दौड़ा आया और चरणों में सिर रख कर बोला -“आज से तुम्हीं मेरी माँ हो। अशोक को तो फाँसी हो गयी। मैं तो तुम्हारा मनोज हूँ।”
अशोक की माँ भी वहीं खड़ी थी। बोली -“सत्य ही है। इसको जीवन दान देने वाली माँ तो आप ही हो।”
और अशोक वहीं रह गया। उसने जीवन भर मनोज की भाँति उसकी सेवा की।
परोपकार से स्वयं का उपकार सहज ही हो जाता है।

4 Likes

भ्रष्टाचार

एक राजा खजाने की निरन्तर हानि से परेशान था। प्रजा पर कर (टेक्स) बढ़ रहे थे, परन्तु खजाना खाली हो रहा था। एक बार उसने प्रबुद्ध वर्ग का एक सम्मेलन किया और अपनी समस्या रखी।
एक वृद्ध ने बर्फ का बड़ा टुकड़ा मँगाया और अपने हाथ से क्रमशः हाथों-हाथ राजा के पास पहुँचाया। वह बर्फ का टुकड़ा जब राजा के पास पहुँचा तो बहुत छोटे आँवला जितना था।
राजा को समाधान मिल चूका था। उसने अपने मंत्री, कोषाध्यक्ष और कर्मचारियों की जाँच कराई। चोरी पकड़ी गयी, दोषियों को दण्ड दिया गया। उस वृद्ध को ही राजा ने अपना सलाहकार नियुक्त कर दिया। खजाने की आय स्वयमेव बढ़ने लगी।
भ्र्ष्टाचार का उन्मूलन ही समस्याओं का सही समाधान है।

5 Likes

परिग्रह की असारता

विदिशा में एक व्यापारी था सोमचंद। तीन मंजिला बिल्डिंग थी। नीचे दुकान, बीच में गोदाम और ऊपर आवास था। करोड़ो रुपये एवं माल घर पर ही रहता था।
सुरक्षा के विचार से उसने ऊपर का जीना दीवाल लगा कर बंद कर दिया था। दरवाजों और खिड़कियों को भी रात्रि के समय बन्द करके ताला डाल देता था।
एक रात को माता-पिता कमरे में सो रहे थे। वह पत्नी और इकलौते पुत्र सहित स्वयं अपने कमरे में सो रहा था। लगभग डेढ़ करोड़ रुपये घर में रखे थे। उसी दिन घी का ट्रक आया था। डिब्बे जीने (सीढ़िया) में भी भरे थे। अचानक बिजली का फॉल्ट होने से आग लगी और घर में फैल गयी।
कही से कोई घुस भी नहीं सका। उसने फोन किये परन्तु सब बेकार गये। नीचे भीड़ देख रही थी परन्तु कोई कुछ भी न कर सका। माता-पिता अपने कमरे में तथा पत्नी और बच्चा भी आग में बुरी तरह जल गये और तड़प-तड़प कर मर गये। लगभग (३५) पैंतीस वर्षीय व्यापारी सोमचन्द डेढ़ करोड़ रुपये बचाने के चक्कर में नीचे आया और वह भी जल कर मर ही गया।
आग अत्यन्त कठिनाई से शान्त हो पाई, परन्तु जली हुई बिल्डिंग ‘परिग्रह की असारता’ और दुःख को प्रगट कर रही थी।
सत्य ही कहा है कि गृहस्थ को भी परिग्रह की सीमा अवश्य कर ही लेना चाहिए और परोपकारी कार्यों में खर्च करते रहना चाहिए।
अपनी शक्ति एवं समय को बचाकर, स्वयं भी धर्माराधना करते हुए, इस दुर्लभ अवसर का सदुपयोग कर लेना ही श्रेयस्कर है।

3 Likes

अंधविश्वास का अन्त

सुमित कॉलेज में पढ़ता था। छुट्टियों में घर आया। उसके छोटे भाई को कई दिन से बुखार चढ़ा था। माँ से वैद्य की दवाई दिलाने के लिए कहा तो वे बोलीं - “दवाई से क्या होगा ? देवी के मंदिर में नारियल, मिश्री और ग्यारह रुपये पुजारीजी को दे आओ। यहाँ तो लोग यही करते हैं।”
उसने कुछ सोचा फिर पोल खोलने के अभिप्राय से बीस रुपये लेकर मित्र के साथ चला। एक नारियल और मिश्री उसने बाजार से खरीदे। मंदिर में पहुँच कर उसने पुजारी को नारियल और मिश्री देते हुए कहा -“उसके छोटे भाई को बुखार चढ़ा है।”
उसने रुपये और माँगे।
सुमित ने कहा - “रुपये नहीं है।”
पुजारी - " बिना रुपये दिये बुखार नहीं उतरेगा।"
सुमित - “तब हमारा नारियल, मिश्री हमें दे दो।”
कह कर उसने नारियल मिश्री उठा ली। पुजारी ने सुमित और उसके मित्र को भला-बुरा कहा, परन्तु दोनों मित्र चले आये। नारियल और मिश्री तो उन्होंने गरीबों के मोहल्ले में बच्चों को बाँट दिए और ५ रुपये एक गरीब विधवा को दे दिए। बुखार की दवा वैद्यजी के यहाँ से छोटे भाई की हालत बताकर ले ली।
घर जाकर माँ से वैसे ही कह दिया कि प्रसाद दे आये हैं और पुजारी ने दवा भी देने के लिए कहा है और छोटे भाई को दवा दी।
तीन दिन में बुखार ठीक हो गया। माँ ने कहा -" सुमित बेटा ! प्रसाद का चमत्कार देखा ?"
सुमित ने कहा - " मैंने प्रसाद दिया ही नहीं था। बुखार तो दवा से ठीक हुआ है। "
यह सुनकर माँ को भी सत्य समझ में आ गया। तब दोनों मित्रों ने गाँव के और लोगों को यह घटना सुनाई और लोगों का अंधविश्वास दूर हुआ।
भगवन्तों की निष्काम भक्ति भी अपने परिणामों की विशुद्धि के लिए की जाती है। भक्ति में स्वरुप का चिन्तन, हमारे भेदविज्ञान और तत्त्वविचार में निमित्त होता है।
लौकिक कामनाएँ तो हमें मात्र भटकाती ही है। वे तो पुण्योदय में सहज ही पूरी हो जायें तो अलग बात है, परन्तु भक्ति, जप आदि अनुष्ठान करते हुए वे पूरी हो ही जायेंगी, ऐसी आशा नहीं रखनी चाहिए और न ही ऐसी मान्यता बनानी चाहिए

3 Likes

सम्पत्ति एक, रुप दो

एक सेठ किशनचंद को अपने धन का अत्यन्त अभिमान था। गरीबों की तो वह हँसी उड़ाता रहता। व्यवहार में भी उनका शोषण ही करता। काम कराके पैसे देने में झगड़ा करता। व्यापार में उन्हें ठगता। बेचारे कुछ कह न पाते, परन्तु अन्तरंग में दुःखी होते।
दान भी जहाँ यश मिलता, वहाँ करता। पूजादि अनुष्ठानों में भी प्रदर्शन ही करता और अपनी सम्पदा, व्यापार आदि की वृध्दि की मनौती ही मनाता।
एक दिन रात्रि को घर में सोसो रहा था। कुछ डाकू आ गये। नाना प्रकार से कष्ट देकर मार गये और धन लूट ले गये। उसका लड़का समीर बाहर रहता था। समाचार सुनकर आया, बचपन में स्वर्गीय दादी के संस्कार थे। पिता को भी वह इन कार्यों से रोकने का प्रयत्न करता था, परन्तु उसकी चलती नहीं थी ; अतः वह अपनी शिक्षा पूरी करके सर्विस करना ही उचित समझकर, शान्तिपूर्ण जीवन चला रहा था।
समीर ने बची हुई सम्पत्ति को बहीखातों के अनुसार संभाला। जिनका देना था, दिया और शेष सम्पत्ति का एक परोपकार ट्रष्ट बना दिया। जिससे उसने अपनी ही दुकानों से एक में धर्मार्थ औषधालय तथा दूसरे में पुस्तकालय एवं वाचनालय खोल दिया और घर में धार्मिक पाठशाला संचालित करवाई।
सम्पदा जहाँ की वहाँ। अपने परिणामों के अनुसार उसका उपयोग होता है, इसलिए सत्य ही कहा है कि -
’ बच्चों को भी सम्पदा और सुविधाओं की अपेक्षा,अच्छे संस्कार देना अधिक आवश्यक है।'

2 Likes

अंधश्रद्धा

सातवीं कक्षा का एक छात्र सुलभ अत्यन्त उदास था। पढ़ने में ठीक था, परन्तु बीमार हो जाने से अच्छी तरह पढ़ाई न हो पाई। परीक्षा निकट थी। उसका एक सहपाठी बोला -“चिन्ता क्यों करते हो। अपने स्कूल के ही पीछे टीले पर एक देव का थान बना है। वहाँ सोमवार को प्रसाद और रुपये चढ़ाने और प्रार्थना करने से परीक्षा में उत्तीर्ण हो ही जाते है।”
सुलभ उस लड़के की बातों में आ गया और स्वयं तो ऐसा करने ही लगा और भी साथियों से ऐसा ही कह दिया। अनेक लड़के ऐसा ही करने लगे और अध्ययन के प्रति आलसी हो गये।
जब परीक्षा में फेल हुए , तब पोल खुली। उनके अध्यापक ने समझाया कि “अंधविश्वासों में उलझकर हम पुरुषार्थ कभी नहीं छोड़ना चाहिए।”
आगामी वर्ष में वे लड़के रुचिपूर्वक पढ़ने लगे और अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हुए।

2 Likes